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साथ साथ, न० : 3 – स्वांस रुपी मंथन

“जो मेरा जीवन है जिस जीवन को लेकर के मैं जिन्दा हूँ, यह जो मंथन हो रहा है क्या निकल रहा है — विष ? मेरे अंदर से क्या निकल रहा है — शांति, आनंद, अमृत या गुस्सा ?” —प्रेम रावत

प्रेम रावत जी:

हमारे सभी श्रोताओं को हमारा नमस्कार। और आज के दिन मैं आपसे यही बात करना चाहता हूं कि देखिये, चाहे बाहर कितना भी अंधेरा हो और क्योंकि जो कुछ भी आज हो रहा है इसके कारण कई लोग हैं जिनको यह लगता है कि बाहर बहुत ही अंधेरा है और मैं यह बात सरासर मानता हूं कि सचमुच में बाहर बहुत अंधेरा है। परंतु बात बाहर की नहीं है, बात हमारे अंदर की है और हमारे अंदर एक उजाला है, एक दिया है जो जल रहा है और उजाला दे रहा है।

देखिये, आपने यह सुना होगा कि एक बार समुद्र मंथन हुआ था, एक तरफ देवता और एक तरफ दानव। और उन्होंने एक पहाड़ लिया और उस पर रस्सी बांधी, (सांप था वह, शेषनाग) और फिर समुद्र मंथन हुआ और काफी सारी चीजें निकलीं। तो मैं एक दिन सोच रहा था कि इस कहानी का तुक क्या है, इसका मतलब क्या है! मंथन हो रहा है और समुद्र में से ये सारी चीजें निकल रही हैं।

तो जब कोई भी कहानी, अच्छी कहानी हो और उसको मैं सुनता हूं तो उसका क्या मतलब है मेरे जीवन में यह मैं जानने की कोशिश करता हूं। तो मैं जब सोचने लगा इसके बारे में तो मैंने कहा, “हम्म, मेरा भी इस जीवन के अंदर एक मंथन हो रहा है और एक तरफ यह स्वांस आ रहा है और जा रहा है।” एक तरफ जाने का मतलब, क्योंकि जाना — इस स्वांस का जाना यह आखिरी चीज होगी जो मैं करूंगा और पहली चीज जो मैंने की वह थी इस स्वांस का आना, जाना नहीं आना। पहले मैंने स्वांस लिया और जिंदगी ने अपनी तरफ खींचा। मैं जीवित था। और हर समय मौत भी खींचती है और यह स्वांस जाता है। फिर आता है, फिर जाता है, फिर आता है, फिर जाता है और उस कहानी में तो जब समुद्र मंथन हुआ तो बहुत सारी चीजें निकलीं — विष भी निकला और अमृत भी निकला। यह जो मंथन हो रहा है इससे क्या निकल रहा है ? इससे क्या निकल रहा है!

जो मेरा जीवन है जिस जीवन को लेकर के मैं जिन्दा हूँ, यह जो मंथन हो रहा है क्या निकल रहा है — विष ? मेरे अंदर से क्या निकल रहा है — शांति, आनंद, अमृत या गुस्सा ? और ये सारी चीजें मनुष्य के अंदर हैं और यह मंथन हो रहा है। जीवन-मौत, जीवन-मौत, जीवन-मौत, जीवन-मौत और ये सारी चीजें हैं और पूछना यह है अपने आपसे कि क्या सचमुच में मेरे अंदर अमृत है, जो सुंदरता है, जो आनंद है वो आ रहा है बाहर या वो चीजें बाहर आ रही हैं जो न मेरे को पसंद हैं, जो न मैं उनको चाहता हूं, न वह किसी के लिए भला करेंगी। घमंड है — मनुष्य को जब घमंड होने लगता है तो वह यह भूल जाता है कि यह जिंदगी और मौत के बीच में लटका हुआ है।

एक कहानी है कि एक बार एक राजा हाथी पर बैठा हुआ था। वह भी नशे में धुत था, हाथी भी नशे में धुत था और हाथी ने राजा को गिरा दिया। गिरते-गिरते राजा एक कुएं में जा गिरा। गिरते समय राजा को होश आया कि मैं गिर रहा हूं तो उसने हाथ से पकड़ने की कोशिश की और एक टहनी थी उसको पकड़ लिया। लिया। अब वह देखता है, अब उसको होश आया तो वह देखता है कि एक टहनी पकड़ी हुई है और नीचे देखता है तो नीचे बड़े-बड़े मगरमच्छ, बड़े-बड़े सांप और वो चाहते हैं कि राजा गिरे ताकि वो उसको खा जाएं। राजा ऊपर देखता है क्या हालत है, तो दो चूहे एक सफेद, एक काला उस टहनी को काट रहे हैं, जिस टहनी को राजा ने पकड़ा हुआ है।

मतलब, स्पष्ट है बात कि हम अज्ञानता के कारण, न जानने के कारण और मैं यह भी कहना चाहता हूं कि एक तो बात होती है न जानना और एक बात यह होती है कि जानबूझकर न जानना — जानते हुए भी अंजान बनना, बहाना बनाना। सभी लोग बहाना बनाते हैं। क्या बनाते हैं बहाना — “हमारे पास टाइम नहीं है!” मतलब, क्या कह रहे हैं आप ? क्या कह रहे हैं टाइम नहीं है, किस चीज के लिए टाइम नहीं है! अपना टाइम बर्बाद करने के लिए तो टाइम सबके पास है, अपना टाइम बर्बाद करने के लिए तो टाइम सबके पास है, परंतु इस टाइम को, इसका सदुपयोग करने के लिए किसी के पास टाइम नहीं है। उलटी गंगा बह रही है। क्या हो गया है इस संसार में —

ये जग अंधा मैं केहि समझाऊं,

सभी भुलाना पेट का धन्धा, मैं केहि समझाऊं।

क्या करूं ?

गुरु विचारा क्या करै, शब्द न लागा अंग ।

कहैं कबीर मैली गजी, कैसे लागै रंग ।।

कुछ नहीं!

आती है बात अंदर मनुष्य क्या देखता है ? अपनी मुसीबतों को देखता है और मुसीबत से बचाने वाला कहता है, “अच्छा वहां मत जाना — वहीं जाता है। यह मत करना — वही करता है।” किसी भी संकट में अपने आपको मत भूलो; किसी भी संकट में इस स्वांस को मत भूलो, इस जिंदगी को मत भूलो। क्या भूलता है आदमी, उसी चीज को भूलता है। कितना भी अंधेरा बाहर हो तुम्हारे अंदर उजाला है, उसी को भूलता है। फिर जब दुखी होता है तब उसके लिए सारा टाइम ही टाइम है, टाइम ही टाइम है, टाइम ही टाइम है। जो आदमी दुखी है वह कभी यह नहीं कहेगा मेरे पास टाइम नहीं है, मेरे पास टाइम नहीं है, मेरे पास टाइम नहीं है।

सुख में सुमिरन ना किया, दु:ख में किया याद ।

कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ॥

जब सबकुछ अच्छा है तब तो इस चीज की तरफ ध्यान ही नहीं गया और जब सबकुछ गड़बड़ होगा तब मनुष्य कि “अब मैं क्या करूँ, अब मैं क्या करूँ, अब मैं क्या करूँ।” वह सोचता है कि “मैं यह कर दूंगा तो मैं यह पा लूंगा या यह पा लूंगा या यह पा लूंगा” और जो पाया हुआ है उसको भूल जाता है। मनुष्य के साथ तो फिर यही बात हो गयी न कि जेब में छेद है, जेब में छेद है और खूब सारा, जहां भी वह जा रहा है उसको हीरे मिल रहे हैं, एक हीरा यहां मिला उसने हीरा उठाया अपनी जेब में डाला, परन्तु जेब में छेद है वह गिर गया। दो-तीन कदम आगे और बढ़ा फिर एक हीरा मिला। हीरे को जेब में रखा परन्तु जेब में छेद है। अच्छा, यह मालूम नहीं है मनुष्य को कि “मेरे जेब में छेद है।” यह नहीं मालूम और यही सबसे बड़ी चीज है। जो पाया भी उसको बचा नहीं पाओगे, उसको रख नहीं पाओगे। क्यों नहीं रख पाओगे; क्यों नहीं बचा पाओगे उसको ? क्योंकि जेब में छेद है।

ठीक, ठीक इसी प्रकार का छेद अज्ञानता है। और इस अज्ञानता की वजह से जो कुछ भी तुम्हारे पास आता है तुम उसको बचा नहीं पाते। यह जो मंथन हो रहा है इसमें से अच्छा भी निकल रहा है और बुरा भी निकल रहा है। बचाना चाहिए अच्छे को, फेंक देना चाहिए बुरे को और तुम उल्टा कर रहे हो जो बुरा है उसे बचा रहे हो और जो अच्छा है उसे फेंक रहे हो। और अज्ञानता क्या है ?

दूसरी बात, जो अज्ञानता जानता है कि वह क्या अज्ञानता है और अज्ञानता को जानते हुए भी वह ज्ञान की तरफ नहीं जाता है, अपनी ओर नहीं जाता है, तो फायदा क्या है! ज्ञान का, अज्ञान का, तो फायदा क्या है! जो आदमी पॉकेट में तो फ्लैश लाइट रखी हुई है, टॉर्च रखी हुई और अंधेरे में ठोकर खा रहा है और चिल्ला रहा है “हाय राम, हाय राम, हाय राम, हाय राम, चोट लग गई, चोट लग गई, चोट लग गई, चोट लग गई, कोई बचाओ, यह करो, वह करो।” परन्तु अपनी जेब में हाथ डालकर वह लाइट जलाने के लिए तैयार नहीं है। लाइट में सबकुछ है, फ्लैश लाइट में नयी बल्ब है, सबकुछ ठीक है, नयी बैटरी हैं, सबकुछ ठीक है। खूब अच्छी रोशनी देती है, परन्तु अपने हाथ में वह लेने के लिए तैयार नहीं है। तो ऐसी हालत में क्या होगा ?

खुशखबरी यह है कि जबतक तुम जीवित हो, वह दिया तुम्हारे अंदर जलता रहेगा। और जब तुम उस दीये को अपने से बाहर में लाओगे तो चाहे कितना भी घोर अंधेरा हो, वह घोर अंधेरा नहीं रहेगा। फिर प्रकाश ही प्रकाश हो जाएगा। और प्रकाश का मतलब ? प्रकाश का मतलब यह है कि अब तुम देख सकते हो कौन-सी चीज कहां है, कौन-सी चीज से तुमको बचना है, कौन-सी चीज से तुमको बचने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इधर से मुड़ना है, उधर से मुड़ना है, इधर से चलना है, उधर से चलना है, सब दिखाई देगा — यह है ज्ञान।

और अज्ञानता क्या है ? आँख बंद है, अँधेरा ही अँधेरा है , कभी इधर ठोकर खा रहे हैं, कभी उधर ठोकर खा रहे हैं, कभी उधर ठोकर खा रहे हैं, कभी उधर ठोकर खा रहे हैं, ऐसे करते-करते-करते अगर पैर भी टूट गया तो फिर कहीं जा भी नहीं पायेंगे, एक ही जगह बैठे रहेंगे, एक ही जगह कहेंगें कि “भगवान! मेरे को ऐसा क्यों बनाया, मेरे साथ — मैंने क्या ऐसा किया था, फिर कर्मों की बात होगी, यह होगा, वह होगा।” भगवान की तरफ ध्यान जाएगा तो भगवान की तरफ इसलिए ध्यान नहीं जाएगा कि “भगवान तैनें मेरे को यह मनुष्य शरीर दिया, मैं कितना भाग्यशाली हूं।” वो जहाँ ध्यान जाएगा कि “तैनें मेरे साथ ये अत्याचार क्यों किया! नहीं! यही तो होता है ना ? यही तो होता है। लोग यही करते हैं, “कोई कहीं जाता है, कोई कुछ करता है, कोई कुछ करता है, कोई कुछ करता है, कोई कुछ करता है।”

जो तुम्हारे अंदर भगवान है उसकी भक्ति कैसे होगी ? केला चढ़ाकर ? उसको केला पहुँचाओगे कैसे ? उसकी भक्ति तभी हो सकती है जब एक — तुम अपने आपको जानो, इस जिंदगी को सचेत रूप से जीयो और तीसरी चीज अपने हृदय के अंदर वह आभार भरे। जब यह होगा, तब सबकुछ होगा। और यह नहीं होगा तो कुछ नहीं होगा। खाली हाथ आये थे, खाली हाथ जाओगे — और यही करना चाहते हो तो उसमें कोई खराबी नहीं है, करो, कोई बात नहीं है। परन्तु क्योंकि तुमको मनुष्य शरीर मिला है, तो एक संभावना उत्पन्न हुई है और वह संभावना यह है कि तुम आनंद से भर जाओ, तुम्हारा हृदय रूपी यह जो प्याला है वह आनंद से भर जाए। यह हो सकता है, यह हो सकता है। सोचो, विचारो और अपना ख्याल रखो और आनंद लो।

सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!