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लॉकडाउन प्रेम रावत जी के साथ #57 (21 मई, 2020) – Hindi

“अगर हम चाहें तो सारे संसार के अंदर स्वर्ग स्थापित कर सकते हैं।” —प्रेम रावत

प्रेम रावत जी “पीस एजुकेशन प्रोग्राम” कार्यशालाओं की वीडियो श्रृंखला को आप तक प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहे हैं। इस दौरान हम उनके कुछ बेहतरीन कार्यक्रमों से निर्मित लॉकडाउन वीडियो आप के लिए प्रसारित करेंगे।

प्रेम रावत:

तो जो बात मैं कहना चाहता हूं कि यहां आप इस जेल में हैं और मैं कई जेलों में जाता हूं अपनी बात कहने के लिए और मेरे को अच्छी तरीके से मालूम है कि आप लोगों के ध्यान में सबेरे से लेकर शाम तक एक ही बात रहती है — और वो यह है कि ‘‘यहां से कैसे निकलें ?”

क्यों, मैं ठीक कह रहा हूं ? शर्माइए नहीं आप! मेरे को मालूम है। पर इस जेल से निकलने में मैं आपकी मदद नहीं कर सकता, पर एक और जेल है, जिसमें सभी लोग बंद हैं। और वो जेल ऐसी है कि इससे भी खतरनाक। यहां से एक दिन न एक दिन तो आपको जाना है, पर एक ऐसी जेल है, जिसके ताले इतने बड़े हैं कि उनको खोलना बहुत मुश्किल है। और उस जेल से — वो, जो दूसरी जेल है, उससे मैं आपको बाहर निकाल सकता हूं। और यही मैं करता हूं। और उस जेल में सब बंद हैं। जो अपने को स्वतंत्र भी समझते हैं, वो भी उस जेल में बंद हैं। और वो क्या जेल है ? वो ऐसी जेल है, जिसमें मनुष्य अपनी अच्छाई को नहीं, पर अपनी बुराई को आगे लेता है। शांति को नहीं, वो अशांति का साथ देता है। प्रकाश का नहीं, वो अंधेरे का साथ देता है। और इसी वजह से जहां भी आप देख लो, इस संसार के अंदर हाहाकार मची हुई है। जहां भी आप देख लो, इस संसार के अंदर लोग एक-दूसरे को मारने के लिए तैयार हैं। आखिर होगा क्या ? एक तरफ हमको यह मनुष्य शरीर मिला है। एक तरफ हमको यह मनुष्य शरीर मिला है और यह क्या है ?

घट घट मोरा सांइयां, सूनी सेज न कोय।

बलिहारी उस घट की, जिस घट परगट होय।।

ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है, ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है, जिसके घट में वो सांई न बसा हो! ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है इस संसार के अंदर! बस, इतनी बात है कि — बलिहारी उस घट की, जिस घट में उस सांई को प्रगट होने का मौका मिला है।

आपने अपने जीवन में — या कोई भी हो यहां। ऐसा आप क्या करते हैं एक दिन में, ऐसा आप क्या करते हैं अपने जीवन में, जिससे वो अच्छाई, वो सच्चाई जो आपके अंदर व्यापक है, वो बाहर उभरकर के आए ?

भीखा भूखा कोई नहीं, सबकी गठरी लाल।

गठरी खोलना भूल गए, इस विधि भए कंगाल।।

कितने लोग हैं यहां, जो अपनी तकदीर को कोसते हैं ? ‘‘क्या हो गया मेरे साथ ?’’ जेल में ही नहीं, जेल से बाहर भी बहुत हैं, जो अपनी तकदीर को दोष दे रहे हैं कि ‘‘मेरे साथ क्या हो रहा है ?’’ अपने को अभागा महसूस करते हैं। कोई ऐसा नहीं है, जो अपने को अभागा महसूस न करता हो। चाहे थोड़े ही क्षण के लिए करता हो, पर अपने को अभागा महसूस करता है। बच्चा फेल हो जाता है। उसके मां-बाप उसको कोसते हैं और वह अपने को अभागा मानना शुरू कर देता है। किसी की नौकरी निकल जाती है, वह अपने भाग्य को कोसता है। किसी से गलती हो जाती है, वह अपने भाग्य को कोसता है। और एक तरफ तो यह बात है कि मनुष्य अपने भाग्य को कोस रहा है और दूसरी तरफ कबीरदास जी कहते हैं कि —

भीखा भूखा कोई नहीं, सबकी गठरी लाल।

गठरी खोलना भूल गए, इस विधि भए कंगाल।।

किस गठरी की बात हो रही है ? क्या भूल गए हम ऐसी चीज ?

तो सबसे पहले क्या भूल जाते हैं हम कि हम मनुष्य हैं।

तुम जब इस संसार के अंदर आए तो कैसे आए ? तुम किसी भी धर्म के हो, तुमने अपने जीवन में कुछ भी किया हो, पर आए कैसे इस संसार के अंदर ? पहली स्वांस — पहली स्वांस जो तुमने ली, वो क्या ली ? बाहर से अंदर! पहली जो स्वांस तुमने ली, वो ली, बाहर से अंदर! और जब तुम इस दुनिया से जाओगे, जो तुम्हारी आखिरी स्वांस होगी, वो क्या होगी ? अंदर से बाहर! अंदर से बाहर! बाहर से अंदर नहीं, अंदर से बाहर! आए कैसे थे ? अंदर से बाहर नहीं, बाहर से अंदर वो स्वांस ली और जब जाओगे तो जो अंदर से बाहर आएगी, वो तुम्हारी आखिरी स्वांस होगी।

जब तुम आए थे संसार के अंदर, किसी ने — एक समय था, जिसमें किसी ने ये नहीं पूछा — तुम लड़का हो, लड़की हो, सिर्फ एक ध्यान था — स्वांस ले रहे हो या नहीं ले रहे हो ? सिर्फ! उसके बाद — लड़का है, लड़की है। ये है, वो है! स्वांस ले रहे हो या नहीं ले रहे हो। और जब तुम्हारा अंतिम समय आएगा तो डॉक्टर क्या देखेगा ? स्वांस ले रहे हो या नहीं ले रहे हो ? कभी ख्याल गया है इसके ऊपर ? कभी ख्याल गया है इसके ऊपर ? नहीं। अपनी समस्याओं का हल ढूंढ़ना है। मेरी क्या समस्या है ? ‘‘आज यह समस्या है। आज यह समस्या है। आज यह समस्या है, आज यह समस्या है। मेरे साथ यह बुरा हुआ, मेरे साथ यह बुरा हुआ, मेरे साथ यह बुरा हुआ। अब मैं यह कैसे करूंगा ? अब मैं यह कैसे करूंगा ? अब मैं यह कैसे करूंगा ?’’ और यह जो स्वांस आ रहा है, जा रहा है, इसके ऊपर एक सेकेंड का ध्यान नहीं है। और इसके बिना तुम हो क्या ?

यह जो जीवन मिला है, आज जो तुम जीवित हो, इसका क्या मायने है तुम्हारे जीवन के अंदर ? आज जो तुम जीवित हो! फिर मैं एक कबीरदास जी का भजन है, मुझे बहुत अच्छा लगता है यह भजन। और आप ने हो सकता है, सुना हो कि —

पानी में मीन पियासी, मोहे सुन सुन आवे हाँसी।

मीन का मतलब है — मछली! पानी का मतलब तो आप लोग जानते हैं।

पानी में मीन पियासी, मोहे सुन सुन आवे हाँसी।

वो मीन है कौन ? वो मीन तुम हो! हम सब लोग हैं वो मीन। वो मछली, जो पानी में रहते हुए भी प्यासी है। पानी में रहते हुए भी प्यासी है और कबीरदास जी कहते हैं — यह सुनकर के मेरे को हँसी आती है।

आतमज्ञान बिना नर भटके, क्या मथुरा क्या काशी।

आतमज्ञान बिना नर भटके, क्या मथुरा क्या काशी।।

मृग नाभि में है कस्तूरी, बन बन फिरै उदासी।।

सुनिए बात! आत्मज्ञान! अब जिसने अपने आपको नहीं समझा, वो भाग रहा है। कुछ कर रहा है, कुछ कर रहा है, कुछ कर रहा है!

क्या मथुरा, क्या काशी। मृग नाभि में है कस्तूरी

उस कस्तूरी को वो खोज रहा है।

मृग नाभि में है कस्तूरी!

सबसे बड़ी बात क्या ? बन-बन — हर एक-एक वन से लेकर, एक जंगल से लेकर दूसरे जंगल तक। बन बन फिरै — कैसे ? उदासी! उदास होकर के! यही नहीं बात है कि वो खोज रहा है। नहीं! वो उदास भी है, क्योंकि जिस चीज को वो खोज रहा है, वो मिल नहीं रही है। वो मिल नहीं रही है। और जब मनुष्य अपने आपको नहीं समझता है — जब मनुष्य अपने आपको नहीं समझता है तो वो भी इस संसार में रहते हुए भी उदास है, क्योंकि जो है उसके पास, वो नहीं जानता है कि वो कहां है, क्या है ?

जल बिच कमल, कमल बिच कलियां, जा में भंवर लुभासी।

तालाब के बीच में कमल का फूल, उसमें कलियां होती हैं।

जल बिच कमल, कमल बिच कलियां, जा में भंवर लुभासी।

उसमें भौरें घूमते रहते हैं उस कमल के आसपास — भौं, भौं, भौं, भौं! भौं, भौं, भौं, भौं करके!

सो मन बस तिरलोक भयो सब, यती सती संन्यासी।।

जैसे वो भौरें कमल के फूल के पास घूमते रहते हैं, भँवरते रहते हैं, वैसे ही तुम्हारा मन तीनों लोकों में जाता रहता है, भ्रमण करता रहता है — कभी कहीं, कभी कहीं, कभी कहीं, कभी कहीं।

कभी कहीं भाग रहा है, कभी कहीं भाग रहा है, कभी कहीं भाग रहा है, कभी कहीं भाग रहा है। तो —

विधि, हरि, हर जाको ध्यान करत हैं, मुनिजन सहस अठासी।

सब मुनिजन जिसका ध्यान करते हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी जिसका ध्यान करते हैं। यह बात पहले कभी नहीं सुनी होगी आपने। जिसका सब ध्यान करते हैं — ब्रह्मा, विष्णु, महेश।

…..मुनिजन सहस अट्ठासी।

सोई हंस तेरे घट माहीं —

सोई हंस तेरे घट माहीं, अलख पुरुष अविनाशी।।

ये क्या कह दिया ? जिसका ध्यान ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी करते हैं, जो अलख पुरुष है, जो अविनाशी है, वो तुम्हारे घट में विराजमान है। कबीरदास जी तो यही कह रहे हैं।

सोई हंस तेरे घट माहीं, अलख पुरुष अविनाशी।।

समझे आप इस बात को ? मतलब, वो कह रहे हैं कि वो जो चीज है, जिसका सब ध्यान करते हैं, वो जो अलख पुरुष है, वो — जिसका सब ध्यान करते हैं, वो आपके घट में मौजूद है। आपके अंदर मौजूद है। समझ में आई बात ?

तो आप अपने को अभागा समझते हैं ? मैं पूछता हूं, जिसके अंदर वो विराजमान है — जबतक आप जीवित हैं, जिसके अंदर वो विराजमान है, आपको कमी किस चीज की है ? पर नहीं जानते न ? नहीं जानते हैं उसको ? नहीं जानते इस स्वांस की कीमत ? नहीं जानते कि क्या मिला है ? नहीं जानते कि यह मनुष्य शरीर जो मिला है, इसका सच में सदुपयोग कैसे किया जाए, क्योंकि यह कितनी सुंदर चीज है।

अगर जो बात मैं कह रहा हूं, यह समझे कि जो हो गया, सो हो गया, पर आगे क्या करना है ? यह आपके ऊपर निर्भर है। आप स्वर्ग बना सकते हैं या नरक बना सकते हैं। यह बात सिर्फ जेल की नहीं है। यह बात तो परिवार की भी है। परिवार में माता, बहन, पति, बेटे, बच्चे, जो कुछ भी हैं, ये भी नरक बना सकते हैं, वो भी स्वर्ग बना सकते हैं। अगर हम चाहें तो सारे संसार के अंदर स्वर्ग स्थापित कर सकते हैं। तो यही मैं आपसे कहना चाहता था। मेरे को आशा है कि आप कम से कम इस बात पर विचार करेंगे और अपने जीवन को सफल करेंगे।