!function(e){var t={};function o(i){if(t[i])return t[i].exports;var r=t[i]={i:i,l:!1,exports:{}};return e[i].call(r.exports,r,r.exports,o),r.l=!0,r.exports}o.m=e,o.c=t,o.d=function(e,t,i){o.o(e,t)||Object.defineProperty(e,t,{enumerable:!0,get:i})},o.r=function(e){"undefined"!=typeof Symbol&&Symbol.toStringTag&&Object.defineProperty(e,Symbol.toStringTag,{value:"Module"}),Object.defineProperty(e,"__esModule",{value:!0})},o.t=function(e,t){if(1&t&&(e=o(e)),8&t)return e;if(4&t&&"object"==typeof e&&e&&e.__esModule)return e;var i=Object.create(null);if(o.r(i),Object.defineProperty(i,"default",{enumerable:!0,value:e}),2&t&&"string"!=typeof e)for(var r in e)o.d(i,r,function(t){return e[t]}.bind(null,r));return i},o.n=function(e){var t=e&&e.__esModule?function(){return e.default}:function(){return e};return o.d(t,"a",t),t},o.o=function(e,t){return Object.prototype.hasOwnProperty.call(e,t)},o.p="",o(o.s=8)}([function(e,t){e.exports=window.wp.data},function(e,t){e.exports=window.wp.element},function(e,t){e.exports=window.wp.components},function(e,t){e.exports=window.wp.i18n},function(e,t,o){"use strict";Object.defineProperty(t,"__esModule",{value:!0}),t.redirectOnSaveCompletion=void 0;var i=o(0),r=function(e){var t=(0,i.select)("core/editor").getCurrentPostAttribute("status"),o=(0,i.select)("core/editor").getEditedPostAttribute("status");"dp-rewrite-republish"===t&&"publish"===o&&(0,i.dispatch)("core/editor").editPost({status:t}),window.location.assign(e)};t.redirectOnSaveCompletion=function(e,t){var o=(0,i.select)("core/editor").isSavingPost(),n=(0,i.select)("core/editor").isAutosavingPost(),s=(0,i.select)("core/edit-post").hasMetaBoxes(),a=(0,i.select)("core/edit-post").isSavingMetaBoxes();return s&&!a&&t.wasSavingMetaboxes&&r(e),s||o||!t.wasSavingPost||t.wasAutoSavingPost||r(e),{isSavingPost:o,isSavingMetaBoxes:a,isAutosavingPost:n}}},,,,function(e,t,o){"use strict";var i=o(1),r=o(2),n=o(3),s=o(0),a=o(4);var u,l,c,p=function(){(0,s.dispatch)("core/editor").savePost();var e=!1,t=!1,o=!1;(0,s.subscribe)((function(){var i=(0,a.redirectOnSaveCompletion)(duplicatePostStrings.checkLink,{wasSavingPost:e,wasSavingMetaboxes:t,wasAutoSavingPost:o});e=i.isSavingPost,t=i.isSavingMetaBoxes,o=i.isAutosavingPost}))},d={Publish:(0,n.__)("Republish","duplicate-post"),"Publish:":(0,n.__)("Republish:","duplicate-post"),"Publish on:":(0,n.__)("Republish on:","duplicate-post"),"Are you ready to publish?":(0,n.__)("Are you ready to republish your post?","duplicate-post"),"Double-check your settings before publishing.":(0,i.createInterpolateElement)((0,n.__)("After republishing your changes will be merged into the original post and you'll be redirected there.

Do you want to compare your changes with the original version before merging?

","duplicate-post"),{button:wp.element.createElement(r.Button,{isSecondary:!0,onClick:p}),br:wp.element.createElement("br",null)}),Schedule:(0,n.__)("Schedule republish","duplicate-post"),"Schedule…":(0,n.__)("Schedule republish…","duplicate-post"),"post action/button labelSchedule":(0,n.__)("Schedule republish","duplicate-post"),"Are you ready to schedule?":(0,n.__)("Are you ready to schedule the republishing of your post?","duplicate-post"),"Your work will be published at the specified date and time.":(0,i.createInterpolateElement)((0,n.__)("You're about to replace the original with this rewritten post at the specified date and time.

Do you want to compare your changes with the original version before merging?

","duplicate-post"),{button:wp.element.createElement(r.Button,{isSecondary:!0,onClick:p}),br:wp.element.createElement("br",null)}),"is now scheduled. It will go live on":(0,n.__)(", the rewritten post, is now scheduled to replace the original post. It will be published on","duplicate-post")};for(var b in d)(0,n.setLocaleData)((c=[d[b],"duplicate-post"],(l=b)in(u={})?Object.defineProperty(u,l,{value:c,enumerable:!0,configurable:!0,writable:!0}):u[l]=c,u))}]); लॉकडाउन प्रेम रावत जी के साथ #56 (20 मई,2020) – Hindi | Prem Rawat

लॉकडाउन प्रेम रावत जी के साथ #56 (20 मई,2020) – Hindi

“मैं अपना संबंध अंधेरे से नहीं, प्रकाश से बनाना चाहता हूं। मैं अपना संबंध मौत से नहीं, जीवन से बनाना चाहता हूं।” —प्रेम रावत

प्रेम रावत जी “पीस एजुकेशन प्रोग्राम” कार्यशालाओं की वीडियो श्रृंखला को आप तक प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहे हैं। इस दौरान हम उनके कुछ बेहतरीन कार्यक्रमों से निर्मित लॉकडाउन वीडियो आप के लिए प्रसारित करेंगे।

Audio

गंगटोक, सिक्किम

प्रेम रावत:

क्या तुम जानते हो कि इस धरती पर हर क्षण सूर्य उदय होता है। क्या तुम जानते हो ? और इस पृथ्वी पर हर क्षण सूर्य अस्त होता है। पृथ्वी घूम रही है। कहीं न कहीं सूर्य उधर उग रहा है, उदय हो रहा है और कहीं अस्त हो रहा है। कहीं उदय हो रहा है, कहीं अस्त हो रहा है। कहीं उदय हो रहा है, कहीं अस्त हो रहा है। कहीं उदय हो रहा है, कहीं अस्त हो रहा है। परंतु तुम्हारे को क्या है ? ‘‘ओह! अब सबेरा हो गया!’’ कहीं रात हो रही है, कहीं दिन हो रहा है। ये सारा इस पृथ्वी पर सब समय होता रहता है। कभी ऐसा समय नहीं है कि ऐसा नहीं होता है। सूर्य कभी छिपता नहीं है। सूर्य कभी उठता नहीं है। ये तुम सिर्फ देखते हो तो कहते हो, ‘‘अब सूर्य उदय हो गया है!’’ नहीं, सूर्य तो हमेशा कहीं उदय हो रहा है, कहीं अस्त हो रहा है। और जहां मनुष्य है, वो ऊपर की तरफ देखता है, कहता है — ‘‘अब रात हो गयी! अब दिन हो गया! अब उदय हो गया, अब अस्त हो गया।’’ परंतु ये तो सब जगह हो रहा है। एक जगह की बात नहीं है। सब जगह हो रहा है! हमेशा हो रहा है। इसी प्रकार तुम्हारे जीवन में जो भी हो रहा है, तुम उसी चीज को देखते हो, उसी चीज को पहचानते हो और उसी के आधार पर तुम जीना चाहते हो! परंतु सोचो, क्या हो रहा है ?

दुःख क्या है ? दुःख क्या है ? दुःख तुम्हारे अंदर है। सुख क्या है ? सुख तुम्हारे अंदर है। दुःख का स्रोत तुमसे बाहर हो सकता है, पर दुःख तुम्हारे अंदर है। सुख का स्रोत तुमसे बाहर हो सकता है, पर सुख तुम्हारे अंदर है।

एक दिन सचमुच में मैं बहुत परेशान था! परेशान था — क्योंकि मेरे को ऐसी खबर मिली, ऐसी खबर मिली कि उस खबर ने मेरे को परेशान कर दिया। अब मैं अपने ऑफिस में बैठा हूं और परेशान हूं। और वो सारी बातें — ये कैसे हो गया ? ये तो नहीं होना चाहिए था। ये…! मन है! ब्रूम्पऽऽऽ! अपनी बैण्ड बजाने लगा। मैंने कहा — ठीक है! जो भी खबर मेरे को मिली! मिली! इसके बारे में तो मैं कुछ कर नहीं सकता। ये तो हो गया! परंतु ये परेशानी जो मैं महसूस कर रहा हूं, क्या मैं महसूस करना चाहता हूं या नहीं ? ये मैंने अपने आपसे कहा। परेशान होना चाहता है तू या नहीं ? तो अंदर से आवाज आयी — क्या आवाज आयी होगी ?

श्रोतागण: नहीं!

प्रेम रावत:

तुम वहां नहीं थे तो तुमको कैसे मालूम ? वहां नहीं भी थे, फिर भी तुमको मालूम है, क्योंकि तुम भी मनुष्य हो, मैं भी मनुष्य हूं। परेशान तुम भी नहीं होना चाहते, मैं भी नहीं होना चाहता। तो वही बात हुई। ठीक उसी तरीके से मैंने कहा — ‘‘हां तो भाई! परेशान होने की क्या जरूरत है ? काहे के लिए परेशान होता है ?’’

सुख भी मेरे अंदर है, दुःख भी मेरे अंदर है। सुख भी मेरे अंदर है, दुःख भी मेरे अंदर है। परंतु मैं अपना संबंध दुःख से नहीं, सुख से बनाना चाहता हूं। मैं अपना संबंध अंधेरे से नहीं, प्रकाश से बनाना चाहता हूं। मैं अपना संबंध मौत से नहीं, जीवन से बनाना चाहता हूं।

हम तो अपने जीवन में मौत को लिए फिरते हैं। जीवन का हमको पता नहीं। स्वांस की क़दर नहीं, जिसके बिना जीवन नहीं।

स्वांस को क्या जानते हैं हम ? जिस दिन निकलने लगता है, उस दिन हमको याद आती है — स्वांस गया, अरे बाप रे! कहां गया ? बिना स्वांस के तीन मिनट से ज्यादा — चाहे तुम कितने भी बलवान हो, कितनी भी कसरत करते हो, तुम्हारी मसल्स यहां तक भी हों — तीन मिनट जो स्वांस नहीं चला, तो मसल्स भी कुछ नहीं कर पाएंगी। कसरत भी कुछ नहीं कर पाएगी। कितनी जरूरी चीज है ये! अगर तुम स्वांस नहीं ले पाए तो तुम मर जाओगे और तुम्हारे डेथ सर्टिफिकेट में क्या लिखा जाएगा ? मौत हुई, एफेक्सीएशन से। स्वांस न लेने के कारण से मौत हुई! है न ? यही तो लिखा जाएगा न, डेथ सर्टिफिकेट पर ? ये एक मेडिकल कन्डीशन है। ये रैकग्नाइज्ड — इसको मेडिकल साइन्स, डॉक्टर लोग रैकग्नाइज़ करते हैं, इसको जानते हैं कि अगर आदमी स्वांस न ले तो वो मर जाएगा। ठीक है न ?

अच्छा, कभी किसी को टीवी न देखने से मरना जो है, कभी सुना है इसके बारे में ? क्योंकि इसके लिए कोई मेडिकल टर्म नहीं है कि — ये आदमी टीवी न देखने के कारण मर गया। या ये आदमी बस की इंतजार करते-करते मर गया। या ये आदमी अपनी गर्ल-फ्रैण्ड के पीछे भागता-भागता मर गया। या ये लड़की अपने ब्वाय-फ्रैण्ड के पीछे भागते-भागते मर गयी। नहीं। ये कोई मेडिकल इस पर नाम नहीं है इसका। परंतु अगर तुमको खाना न मिले, तीन दिन पानी न मिले, तीन हफ्ते खाना न मिले और तीन मिनट हवा न मिले, तुम्हारी हवा निकल जाएगी। तो क्या समझे ?

तो जो मैं कहने के लिए मैं यहां आया हूं, वो खुशखबरी है! क्यों खुशखबरी है कि — शांति आपके अंदर है, सुख आपके अंदर है। क्यों ? जिस चीज की तुमको तलाश है, वो तुम्हारे ही अंदर है। वो ब्रह्म, वो तुम्हारे ही अंदर है। वो भगवान, जिसको तुम बाहर खोजते हो, वो तुम्हारे ही अंदर है। जबतक तुम जीवित हो, तुम्हारे ही अंदर है और उसी की वजह से तुम्हारे अंदर परमानन्द बैठा हुआ है, परमानन्द है! और जहां परमानन्द है, वहां अपार सुख है, अपार शांति है और उसको न जानना ही अपार दुःख है।

मनुष्य के लिए दुःख की क्या परिभाषा है ? सुख में न होना ही मनुष्य के लिए दुःख है। कारण की वजह से नहीं — अगर तुम सुख में नहीं हो तो तुम दुखी हो! चाहे तुम उसको जानते हो या नहीं जानते हो।

ज्ञानी में और अज्ञानी में क्या अंतर है ? यह नहीं है कि ज्ञानी का सिर बड़ा है। यह नहीं है कि ज्ञानी के कंधे बड़े हैं। यह नहीं है कि ज्ञानी का कद बड़ा है। यह नहीं है कि ज्ञानी का वजन कम है। ना! ज्ञानी और अज्ञानी में अंतर यह है कि ज्ञानी जानता है, अज्ञानी नहीं जानता है। और जिसको जानना है, जिसको जानने से वो ज्ञानी बन सकता है और जिसको न जानने से वो अज्ञानी है, वो चीज भी तुम्हारे ही अंदर है। उसको पहचानो, उसको जानो! और जब तुम जान जाओगे, तुम दुःख से बच जाओगे — ये है मेरा संदेश!

लोग सोचते हैं, लोग सोचते हैं कि इस पृथ्वी पर शांति कैसे होगी ? ना, ना, ना, ना, ना, ना! यह गलत सवाल है। क्यों ? सबसे पहले तुममें शांति होनी चाहिए। सबसे पहले तुममें शांति होनी चाहिए। और तब जब तुममें शांति होगी, तब तुम इस संसार से शांति बनाओ! और जब तुम इस संसार से शांति बनाओगे, तब जाकर के इस संसार के अंदर शांति होगी। क्योंकि इस संसार में अशांति का कारण तुम हीं हो। यह अच्छी खबर नहीं है, परंतु मैं क्या करूं ? जब हो ही तुम कारण, तो मैं कैसे कहूं कि तुम नहीं हो। अशांति का कारण मनुष्य है।

शेर को शिकार करने की जरूरत है — है कि नहीं ? शेर को शिकार करने की जरूरत है, परंतु अगर शेर का पेट भरा हुआ है तो वो शिकार नहीं करेगा। मनुष्य ही ऐसा जानवर है कि पेट भरा हुआ है, फिर भी शिकार करेगा। शेर नहीं करेगा ये। शेर को तो शिकार करने की जरूरत है और यहां दुकानें भरी पड़ी हैं खाने के लिए, फिर भी जा रहा है। ऐसा शेर तुमको कहीं नहीं मिलेगा। ऐसा शेर तुमको कहीं नहीं मिलेगा। मच्छर भी — मच्छर भी नहीं काटेगा, अगर उसने पहले काट लिया किसी को, उसका पेट भरा हुआ है। पहले उसको पचाएगा, तब बाद में काटेगा किसी को अगर भूख लगेगी। बिना भूख के वो मच्छर भी नहीं काटता है।

पर मनुष्य है कि बिना भूख के भी शिकार करता है, बिना किसी कारण के काटता है और धर्म क्या है, मनुष्य भूल गया है। और जो कुछ भी मनुष्य करता है, जिसको नहीं मालूम कि असली धर्म क्या है, वही अधर्म है। और इस संसार के अंदर जो अशांति फैली हुई है, वो अधर्म के कारण फैली हुई है। अधर्म जो मनुष्य करता है। क्योंकि उसको यही नहीं मालूम कि वो कौन है ? उसको ये नहीं मालूम कि वो शेर है या बकरी ? कौन है वो ? उसको नहीं मालूम! और अधर्म होता है।

सबसे पहला धर्म क्या है ? विचार करो! उससे पहले कि मनुष्य ने देवी-देवताओं को स्वीकार करना शुरू किया, सबसे पहला धर्म जो मनुष्य ने बनाया, वो धर्म है — दया होनी चाहिए। उदारता होनी चाहिए। इसीलिए तो इन सब चीजों का वर्णन हर एक धार्मिक धर्म में मिलता है। चाहे वो हिन्दू हो, चाहे वो मुसलमान हो, चाहे वो सिख हो, चाहे वो ईसाई हो, चाहे वो बुद्धिष्ट हो! किसी भी धर्म का हो, सभी धर्मों में ये सारी चीजें बराबर हैं। उदारता होनी चाहिए, दया होनी चाहिए, क्षमता होनी चाहिए, क्षमा होनी चाहिए! ये है तुम्हारा धर्म! और जब तुम क्षमा नहीं करते हो, जब तुम दया नहीं करते हो, तुम अधर्म करते हो! और इस अधर्म — नर्क की बात छोड़ो! नर्क की बात छोड़ो! क्यों छोड़ो ? क्योंकि अधर्म के कारण मनुष्य ने नर्क यहीं बना दिया है। मरने की क्या जरूरत है ? नर्क यहीं बना हुआ है! जहां स्वर्ग होना चाहिए, वहां मनुष्य ने नर्क बना दिया है।

असली धर्म को पकड़ो! और वो असली धर्म है — मानवता का धर्म! मानवता का धर्म! जिसमें दया है, उदारता है! और जब उसको पकड़ोगे, अपने आपको पहचानोगे कि तुम कौन हो ? और जब तुम अपने आपको जानोगे, कौन हो ? तो तुम जानोगे कि सुख भी तुम्हारे अंदर है, परमात्मा भी तुम्हारे अंदर है, शांति भी तुम्हारे अंदर है, ज्ञान भी तुम्हारे अंदर है। और यह भी जानोगे कि अज्ञानता भी तुम्हारे अंदर है। अगर तुम जानोगे कि अज्ञानता तुम्हारे अंदर है — नम्र रहो! नम्र रहो! नम्र! नम्रता को स्वीकार करो! क्यों ? अज्ञानता तुम्हारे अंदर है। इसलिए सिर थोड़ा बचा के। नहीं तो जब अज्ञानता की तलवार चलेगी और तुम्हारा — तुम्हारी गरदन होगी ज्यादा ऊपर तो तुरंत जाके तुम्हारी गरदन पर पड़ेगी।

तुम क्या समझते हो ? तुम्हारी अज्ञानता का सबसे बड़ा शिकार कौन बनता है ? कोई और ? तुम्हीं बनते हो। तुम जब गुस्सा करते हो, तुम समझते हो कि वो तुम्हारे गुस्से का शिकार बन रहा है ? नहीं भाई! सबसे पहले तुम्हारे गुस्से का शिकार तुम बनते हो। ब्लड-प्रेशर तुम्हारा बढ़ता है। उसका बढ़े, न बढ़े! दूसरे का बढ़े, न बढ़े, गला तुम्हारा दर्द करेगा। ब्लड-प्रेशर तुम्हारा बढ़ेगा! लाल तुम होगे, दुःख तुमको होगा! तो गुस्से का सबसे पहला शिकार तो हो तुम! उसके बाद दूसरा हो या न हो। पर ये तुमको नहीं मालूम!

जब तुम गुस्सा करते हो — अब गुस्सा भी तो ऐसी चीज है कि जब आता है तो दरवाजे पर खटखटाता तो है नहीं कि ‘‘मैं आ जाऊं ?’’ कहां से आया, कब आया, पता ही नहीं! क्योंकि शब्द क्या है — गुस्सा आया! यही है न ? गुस्सा आया! गुस्सा आता है। ये गलत है। गुस्सा आता नहीं है। गुस्सा तो पहले से ही अंदर है। गुस्सा तो पहले से ही अंदर है! तुम समझते हो, तुमने दरवाजे की चिटकनी बंद कर दी, अब कोई अंदर नहीं आयेगा ? बहुत सारे अंदर आ गये हैं। तुम नहीं जानते हो उनको, पर वो बहुत ही आ गये हैं अंदर। तुम्हारा गुस्सा भी तुम्हारे साथ चलता है। तुम बस में एक सीट की टिकट लेते हो, अरे! तुम्हारा गुस्सा भी तुम्हारे साथ चलता है। तुम्हारी दया भी तुम्हारे साथ चलती है। तुम्हारा ज्ञान भी तुम्हारे साथ चलता है, तुम्हारा अज्ञान भी तुम्हारे साथ चलता है। ये सारी चीजें तो जहां भी तुम जाते हो, तुम्हारे साथ हैं। कोई घर से पैक्ड थोड़े ही करता है ? ये थोड़े ही है कि घर छोड़ दिया अगर तुमने दो दिन के लिए या तीन दिन के लिए तो गुस्सा भी तुम्हारा घर पर ही रह गया या भूल गये पैक करना। ना! जहां भी तुम जाओ, गुस्सा साथ में है। तो गुस्सा आता नहीं है, दुःख आता नहीं है। दुःख पहले से ही वहां है। पर इस बात को समझो! इस बात को जानो!

क्योंकि अगर तुम इन चीजों से ऊपर उठना चाहते हो तो तुम उठ सकते हो। यह तुम पर निर्भर करता है। जिस शांति की मैं बात कर रहा हूं, इसीलिए खुशखबरी है कि — वो शांति पहले से ही तुम्हारे अंदर है। पर शांति का अनुभव कैसे कर पाओगे, अगर दिन-रात तुम अधर्म करते रहते हो ? अधर्म मत करो! धर्म, जो तुम्हारा धर्म है, जो मानवता का धर्म है — देवी-देवताओं के धर्म की बात नहीं कर रहा हूं। ये तो तुम्हारे ऊपर निर्भर करता है। मैं बात कर रहा हूं, तुम्हारा! जो मानव होने के नाते जो तुम्हारा धर्म है, इसको निभाना सीखो! और जिस दिन तुम इसको निभाने लगोगे, तुम्हारे जीवन के अंदर भी आनंद ही आनंद होगा। ये आज की बात नहीं है। ये आज की बात नहीं है। ये बात तो पता नहीं कितने समय से चली आ रही है। तो जानो, पहचानो और अपने जीवन को सफल करो।