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लॉकडाउन प्रेम रावत जी के साथ #46 (10 मई,2020) – Hindi

“किस तरीके से तुम अपनी समस्याओं से बचना चाहते हो? अपनी तरफ कोई नहीं देखता कि खुद में क्या नुक्स है। अपनी ओर देखो, समस्याओं में तुम्हारा क्या योगदान है ?” —प्रेम रावत

प्रेम रावत जी “पीस एजुकेशन प्रोग्राम” कार्यशालाओं की वीडियो श्रृंखला को आप तक प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहे हैं। इस दौरान हम उनके कुछ बेहतरीन कार्यक्रमों से निर्मित लॉकडाउन वीडियो आप के लिए प्रसारित करेंगे।

Audio

प्रेम रावत जी:

हमारे श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!

मुझे आशा है आप सभी लोग कुशल-मंगल होंगे। इन परिस्थितियों को देखते हुए काफी कुछ जो हो रहा है — कभी कुछ होता है, कभी कुछ होता है और अखबार में, न्यूज़ में जो देखने के लिए मिलता है, पर सबसे बड़ी चीज यह है कि कोई भी स्थिति हो सामने आप उस स्थिति को किस तरीके से हैंडल करेंगे ? आप क्या करेंगे ? जो भी परिस्थिति है किसी भी तरीके से अगर उस परिस्थिति को देखा जाए, अच्छी है; बुरी है। परंतु बात परिस्थिति की नहीं है — अच्छा है, बुरा है यह है; वह है, बात है कि आप उस परिस्थिति को — उसके साथ कैसा व्यवहार करेंगे, उस परिस्थिति में कैसा व्यवहार करेंगे ?

कई लोग हैं — अब हिंदुस्तान में अगर देखा जाए या भारतवर्ष में देखा जाए कई लोग हैं जिनको “कोई बात नहीं ठीक है।” परंतु कई लोग हैं जो “भाई! यह क्या हो रहा है, कैसे होगा!” चिंता करते हैं, पर चिंता करने से कुछ होगा नहीं। सबसे बड़ी चीज है कि जो ताकत आपको चाहिए इस परिस्थिति से निकलने के लिए वह आप में है। वह कहीं दूसरे आदमी से नहीं आएगी, दूसरे व्यक्ति से नहीं आएगी वह आपके अंदर है, वह आपसे ही आएगी। परन्तु उसके लिए आपको अपनी तरफ देखना पड़ेगा, औरों की तरफ नहीं। और एक बहुत बड़ी बीमारी है लोगों में वो यह है कि वह देखते हैं दूसरों की तरफ कि “तुम हमारे बारे में क्या सोच रहे हो?” यह बीमारी बहुत बड़ी बीमारी है — “और लोग हमारी तरफ क्या सोच रहे हैं, हमारे बारे में क्या सोच रहे हैं!”

अगर किसी को सोचना चाहिए तुम्हारे बारे में तो वह तुम हो, कोई दूसरा नहीं, वह तुम हो! तुम अपने बारे में क्या सोच रहे हो ? तुम अपने से खुश हो या नहीं! तुम अपने से खुश हो या नहीं ? जब तुम सवेरे-सवेरे उठते हो तो तुम अपनी चिंता करते हो कि “आज मेरा दिन अच्छी तरीके से बीते या औरों की चिंता करते हो और चीजों की चिंता करते हो — इसका क्या होगा, इसका क्या होगा, इसका क्या होगा, मेरे को यह करना है, मेरे को यह करना है, मैं यह कैसे करूंगा, मैं वह कैसे करूंगा!” क्योंकि जो व्यक्ति, जो व्यक्ति अपने से दूर तो जा सकता है, परन्तु नजदीक आने में उसको नहीं मालूम कैसे मैं अपने-अपने पास आऊं, अपने नजदीक आऊं। तो उसका तो एक ही परिणाम होगा जो व्यक्ति अपने घर से बाहर तो जा सकता है पर बाहर जाने के उपरांत अपने घर कैसे वापस आएं यह उसको नहीं मालूम तो उसके साथ क्या होगा ? क्या सोचेंगे आप, क्या होगा उसके साथ ? उसके साथ एक ही चीज होगी और वह चीज है कि वह खोया रहेगा, क्योंकि वह जा तो सकता है, पर वापस कैसे आये यह उसको नहीं मालूम। मनुष्य के साथ आज यही हाल है। वह इस दुनिया में तो चला जाता है, परन्तु अपनी तरफ कैसे वापिस आएं यह उसको नहीं मालूम। क्योंकि यह उसको नहीं मालूम है, सारे चक्करों में पड़ा रहता है, दुखी होता है। क्यों, क्यों दुखी होता है ? क्योंकि उसको यह नहीं मालूम कि मैं घर कैसे जाऊं।

एक चुटकुला है। एक व्यक्ति था तो वह एक दिन रोड के किनारे बैठा हुआ रो रहा था। देखने में तो सबकुछ ठीक था — उसके पास टाई भी थी, सूट भी थी और ऐसा लग रहा था कि काफी अच्छा खाने-पीने वाला आदमी है, पर रो रहा है। तो कोई आया उसके पास, उसने उससे पूछा कि “भाई! तुम रो क्यों रहे हो ? क्या दुःख है तुमको ?”

उसने कहा, “भाई! क्या बताऊँ मेरी अभी नई-नई शादी हुई है। मैं 70 साल का हूं, पर मेरी अभी नई-नई शादी हुई है और मेरी बीवी जो है वह 22 साल की लड़की है और बहुत ही, बहुत ही खूबसूरत है, देखने में वह लाजवाब है।”

तो उस आदमी ने कहा “भाई! यह तो अच्छी बात है। यह हुआ है तेरे साथ, तेरी बीवी है, तेरे को उससे प्यार है, देखने में वह अच्छी है तो तू रो क्यों रहा है ?”

उसने कहा — यही नहीं “मैंने अभी नया-नया घर लिया है और सबसे सुंदर घर है वह, संगमरमर का काम है उसमें, बहुत बड़ा घर है और हर एक चीज का प्रबंध है उस घर में।”

उस आदमी ने पूछा “भाई! इतना सबकुछ तेरे पास है — तेरे पास घर है, तेरी अभी-अभी नई-नई शादी हुई है तो रो क्यों रहा है ?”

उसने कहा — “मैं इसलिए रो रहा हूँ कि मेरे को मालूम नहीं कि मेरा घर कहाँ है, तो मैं कैसे जाऊं वापिस ?”

यह तो हुआ चुटकुला। अब कई लोग हैं जो यह भी समझें कि यह मज़ाकिया बात है। इतना सबकुछ है उसके पास पर उसको यह नहीं मालूम कि वह कहां है, पर इस चुटकुले को जरा आप अपनी तरफ भी तो देखिए “क्या हो सकता है यह आपके साथ भी हो रहा है कि सबकुछ है आपके पास पर आपको यह मालूम नहीं कि वह कहां है ?” जब मैं लोगों से कहता हूं कि “भाई जिस शांति की तुमको तलाश है, काहे के लिए तलाश रहे हो तुम, वह तो तुम्हारे पास है। वह तो पहले से ही तुम्हारे पास है।” तो लोगों का यह है कि “जी! तो कैसे मिलेगी?” कैसे क्या मिलेगी! पहले सबसे छोटी-सी चीज तो यह जानने की है कि “जिस चीज की तुमको तलाश है वह तुम्हारे अंदर है क्या तुम इस बात को स्वीकार करते हो या नहीं ?” जब स्वीकार ही नहीं करते हो इसके बारे में, सोच तो सकते हो इसके बारे में, पर स्वीकार नहीं करते हो। तो जब स्वीकार ही नहीं कर रहे हो, तो तुम्हारी आशाएं किस चीज पर बंधी हुई है कि “बाहर से आएगी, कुछ करना पड़ेगा” और यही लोग चाहते हैं। “मुझे क्या करना पड़ेगा शांति ढूंढने के लिए ? कहां से मिलेगी, कौन-सी चीज पढ़नी पड़ेगी, किस तीर्थ में जाना पड़ेगा, क्या व्रत रखना पड़ेगा ?” इन सारी चीजों में लोग लगे रहते हैं।

पर इन चीजों से नहीं, पहले तो यह स्वीकार करना है कि “जिस चीज की तुमको तलाश है, वह चीज तुम्हारे अंदर है।” जब यह मनुष्य जान लेता है, जो अच्छा — जैसे कई लोग हैं, यह तो उनको मालूम है कि “वह उससे खुश नहीं है, उससे खुश नहीं है, उससे खुश नहीं है, उससे खुश नहीं है।” उनमें तो जो नुक्स है वह एक सेकेंड के अंदर निकालने के लिए सब लोग तैयार हैं — “वह यह करती है, वह यह करता है, वह यह करता है, वह यह करता है, वह यह करता है, मेरे को यह पसंद नहीं है, मेरे को यह पसंद नहीं है।” परन्तु अपनी तरफ कोई नहीं देखता। अपनी तरफ कोई नहीं देखता कि तुममें क्या नुक्स है! किस तरीके से तुम इन सारी चीजों में, जो गड़बड़ हो रहा है, आसपास जिससे तुम बचना चाहते हो उसमें तुम्हारा क्या योगदान है ? तुम्हारा भी तो योगदान होगा उसमें, तुम्हारा क्या योगदान है ? यह कोई नहीं देखना चाहता। सिर्फ ऊँगली उधर करना चाहते हैं कि “वह यह कर रहा है, वह यह कर रहा है, वह यह कर रहा है, वह यह कर रहा है।” तो इससे किसी का फायदा नहीं होना है। इससे किसी को कुछ मिलेगा नहीं।

सबसे पहली चीज, कई चीजें हैं जो तुमको पसंद नहीं हैं। अगर कहीं तुम बैठे हुए हो और कोई कीड़ा यहां चल रहा है और तुम्हारा ध्यान, तुम देखते हो, तुम्हारा ध्यान जाता है वहां, तुम देखते हो कि ऐसे-ऐसे करके कीड़ा आ रहा है ऊपर, क्या करोगे ? क्या करोगे ? छोटी-सी चीज बस! यह थोड़े ही है कि “ओह! कीड़ा आ गया, कीड़ा आ गया, कीड़ा आ गया, कीड़ा आ गया, कीड़ा आ गया, कीड़ा आ गया, कीड़ा आ गया!” नहीं! मैंने देखा है लोगों को सांप दिखाई देता है कहीं और जिनको सांप से डर लगता है, सांप है उधर और वो भाग रहे हैं उधर दूसरी तरफ। यह नहीं कि सांप है, सांप है, सांप है चिल्ला भी रहे हैं, उनको डर भी लग रहा है और सांप को पकड़ने जा रहे हैं, ना! उल्टा भागते हैं, यही बात होती है। जो चीज तुमको पसंद नहीं है, जिस चीज से तुमको नफरत है उस चीज की तरफ क्यों भाग रहे हो ? उल्टा भागो और जब उल्टा भागोगे तुम तो निकलोगे। यह करना भूल जाते हैं लोग। “मेरे को यह पसंद नहीं है, मेरे को वह पसंद नहीं है, अब यह मेरे साथ हो रहा है, मेरे साथ वह हो रहा है।”

पर यह नहीं करते हैं उनको लगता है कि यह करेंगे तो फिर गड़बड़ हो जायेगी। गड़बड़ नहीं होगी, क्योंकि जो चीज है, जो सहानुभूति तुमको चाहिए वह भी तुम्हारे अंदर है, जो शांति तुमको चाहिए वह भी तुम्हारे अंदर है, धीरज भी तुम्हारे अंदर है और तुमको बचाने वाला भी तुम्हारे अंदर है, वह सारी चीजें भी तुम्हारे अंदर है। जैसे क्रोध कहां से आता है कोई टंकी बनी हुई है क्रोध की ? ना! क्रोध तुम्हारे अंदर है और तुम्हारे अंदर से ही आता है। जब तुम खुश होते हो तो वह खुशी कहां से आती है ? किसी टैंक से आती है ? नहीं, वह भी तुम्हारे अंदर से आती है। ठीक उसी प्रकार, ठीक उसी प्रकार जिस आनंद की तुमको तलाश है, जिस चैन की तुमको तलाश है, यह सारी चीजें तुम्हारे अंदर हैं। बाहर से कहीं इनका आना-जाना नहीं है और जबतक यह हम जानेंगे नहीं कि इस तरफ भागना है, जब मुसीबत आती है तो अंदर की तरफ भागना है। तब तक मुसीबत आएगी और हम लड़खड़ायेंगे, हमको पता नहीं लगेगा, हम हैरान होंगे और हमको लगेगा कि यह नहीं है ठीक, वह नहीं है ठीक, तो भाई! ऐसे कुछ नहीं होगा। अंदर की तरफ तुम जा सकते हो, तुम्हारे अंदर वह शक्ति है चाहे कोई भी मुसीबत तुम्हारे जीवन के अंदर आए तुम्हारे अंदर शक्ति है कि तुम उस मुसीबत का सामना कर सको और करो। कोई भी मुसीबत हो। डरने से कुछ नहीं होगा, मुसीबत कोई भी हो तुम्हारे अंदर वह हौसला होना चाहिए, क्योंकि तुम्हारे अंदर वह शक्ति है कि तुम उससे मुकाबला कर सकते हो। आनंद लो अपने जीवन के अंदर।

हां एक बात और है कि विदेश के अंदर “मदर्स डे” है, “मां का दिन” जिसे कहते हैं। हिंदुस्तान में पता नहीं मनाते हैं — कुछ लोग मनाते होंगें, कुछ लोग नहीं मनाते होंगें, पर जितनी भी माताएं हैं उनको मैं मुबारक देता हूँ इस मदर्स डे के लिए, माँ के दिन के लिए और आनंद लो अपने जीवन में।

जो पीस एजुकेशन प्रोग्राम की बात है, ट्रेनिंग की बात है उस पर काम हो रहा है और समय लगेगा क्योंकि जो था वह दूसरा प्रोग्राम है और हम चाहते हैं कि हिंदी में हो यह (जो हिंदी समझते हैं, उनके लिए हो) जो भारत में भी रहते हैं या कहीं भी रहते हैं और अंग्रेजी समझते हैं तो अंग्रेजी में तो होगा ही पीस एजुकेशन प्रोग्राम, उसका नाम अलग होगा, पर होगा। और जो हिंदी में करना चाहते हैं उनको थोड़ी-सी सब्र और रखनी पड़ेगी फिर हिंदी में भी वह होगा।

सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!