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लॉकडाउन प्रेम रावत जी के साथ #39 (1 मई,, 2020) – Hindi

“तुमको सुकून की जरूरत पड़ेगी, शांति की जरूरत पड़ेगी। जब तुम इस संसार से दुखी होगे तो कहां जाओगे! उस प्राणी के लिए जो इस संसार से दुखी है उसके लिए एक ही है और वह तुम्हारे अंदर बैठा हुआ है। वह तुमको संभाल सकता है, वह तुमको बचा सकता है।” —प्रेम रावत (1 मई, 2020)

यदि आप प्रेम रावत जी से कोई प्रश्न पूछना चाहते हैं, तो आप अपने सवाल PremRawat.com (staging.premrawat.com/engage/contact) के माध्यम से भेज सकते हैं।

Audio

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोताओं को हमारा बहुत-बहुत नमस्कार!

आज के दिन भी काफी तैयारियां हो रही हैं, क्योंकि यह 40वें ब्रॉडकास्ट की तरफ बहुत जल्दी पहुंच रहे हैं बल्कि कल 40वां ब्रॉडकास्ट हो जाएगा। और मेरे को थकान भी महसूस हो रही है क्योंकि हर दिन 40 ब्रॉडकास्ट अंग्रेजी में हुई हैं और 40 ब्रॉडकास्ट हिंदी में हुई हैं, तो कुछ दिन तो मैं आराम करूंगा और उसके बाद PEP की तैयारी करेंगे जो पीस एजुकेशन प्रोग्राम है।

बात यह है कि PEP की तैयारी तो हो जाएगी, जब भी PEP आएगा, पर सबसे बड़ी बात है कि जो कुछ भी कहा जा रहा है इसका कोई असर पड़ रहा है लोगों पर या नहीं! क्योंकि कहीं ना कहीं पानी है, कहीं ना कहीं फल है, परन्तु अगर उसका कोई आनंद लेने वाला, उसका कोई फायदा लेने वाला नहीं है तो कहीं ना कहीं वह भी मनुष्य है, जो प्यासा मर रहा है या भूखा मर रहा है। क्योंकि वह वहां नहीं है जहां नदी है, जहां पानी है। वह वहां नहीं है जहां फल है, तो अगर हम अपनी दुनिया के अंदर कुछ इस तरीके से दूर हो जाएं उन चीजों से जिन चीजों की हमको जरूरत है, चाहत की बात नहीं, पर जिन चीजों की हमको जरूरत है — अब सब लोगों को मालूम है कि पानी की आपको जरूरत है, हवा की आपको जरूरत है, भोजन की आपको जरूरत है, सोने की आपको जरूरत है, गर्मी की आपको जरूरत है, ज्यादा गर्मी नहीं ज्यादा ठंडी नहीं। परन्तु क्या हम कभी सोचते हैं कि शांति भी हमारी जरूरत है। हमारा हृदय आनंद से भरे यह भी हमारी जरूरत है, चाहत नहीं जरूरत है। क्योंकि इसके बिना सारा जीवन सूना-सूना लगता है। ऐसा लगता है कि जी रहे हैं, परन्तु क्यों जी रहे हैं यह नहीं मालूम जैसे —

ज्ञान बिना नर सोवहिं ऐसे, लवण बिना भव व्यंजन जैसे।

वही वाली बात हो जाती है किस चीज का ज्ञान ? जो संत-महात्माओं ने हमको कहा है कि हमारे पास ज्ञान होना चाहिए तो वह कैसा ज्ञान है, कौन-सा ज्ञान है तो वह ज्ञान है अपने आपको जानने का —

आत्मज्ञान बिना नर भटके, क्या मथुरा क्या काशी।

आत्मज्ञान — जो स्वयं का ज्ञान है, जो चीज तुम्हारे अंदर है उस चीज का ज्ञान। और अगर नहीं है ज्ञान तो आदमी भटकता है क्योंकि उसको वह चाहिए — उसको शांति चाहिए, उसको आनंद चाहिए, अब यह बातें हम सोचते नहीं हैं इन चीजों के बारे में, क्योंकि यह चीजें हमको नहीं बताई जाती है। हमको यह बताया जाता है “नौकरी करो, यह करो, वह करो, यह ठीक ढंग से करो”, तब जा करके तुम्हारा जीवन आनंद से भरेगा, परंतु हम कभी यह पूछते नहीं है कि “कौन ऐसा व्यक्ति है जिसका जीवन आनंद से भरा हुआ है!” इन दुनियादारी की बातों में रह करके कुछ भी कर लो, कुछ भी कर लो यह तो वही वाली बात है कि — भगवान राम वापिस आए, अब पहले एक बार जब सीता को उन्होंने श्रीलंका से लिया, उनको बचाया वहां से तो उनसे कहा कि “तुम एक इम्तिहान ले लो, अग्नि परीक्षा ले लो ताकि सब लोगों को, जो यहां है उनको पता लग जाए कि तुम पवित्र हो।” वापिस आए, राज्याभिषेक हुआ, सबकुछ हुआ, बहुत अच्छा हुआ, सबकुछ बड़े आनंद से चल रहा था। (मैं भगवान राम की बात कर रहा हूं, मैं भगवान राम की बात कर रहा हूं, मैं छोटे-मोटे किसी की बात नहीं कर रहा हूं, मैं भगवान राम की बात कर रहा हूं) और सबकुछ बड़े अच्छी तरीके से चल रहा था और एक धोबी ने यह कहा कि — उसकी बीवी भाग गई कहीं, रात भर कहीं रही तो जब दूसरे दिन वह वापिस आयी तो कहा कि “मैं तेरे को काहे के लिए रख लूँ, मैं कोई राम थोड़े ही हूं कि मेरी पत्नी कहीं और हो और मैं उसको वापस रख लूँ।” यह जब शब्द, यह जब खबर भगवान राम को मिली तो भगवान राम ने सीता को कहा कि “तुम वनवास — तुम चली जाओ यहां से!”

देखिये! उस समय क्या भगवान राम को दुःख नहीं हुआ, दुःख हुआ! क्या सीता को दुःख नहीं हुआ, बिलकुल हुआ! क्या लक्ष्मण को दुःख नहीं, बिलकुल हुआ! सभी को दुःख हुआ। क्योंकि यह प्रकृति है इस माया की कभी दुख देती है, कभी कुछ होता है, कभी कुछ होता है, कभी कुछ होता है। सुख तो एक ही चीज में है और वह चीज क्या है ? वह चीज है जो तुम्हारे अंदर विराजमान है। उसमें सुख है, उसमें आनंद है। इस दुनिया की सारी चीजों में कहीं ना कहीं मैं नहीं कह रहा कि आनंद नहीं है, परन्तु वह आनंद नहीं है जो हमारे अंदर आनंद है। हां, चंद मिनटों की खुशी जरूर मिलती है, जैसे अगर आप फिल्म देखने के लिए जाएं और वह फिल्म, (हिंदुस्तान में तीन घंटे की होती है, ढ़ाई घंटे की होती है ऐसा ही कुछ है) परन्तु अगर वही फिल्म — “उसमें जाते है, लोग बैठते हैं, हंस रहे हैं, बड़ा अच्छा लगता है लोगों को, बाहर आते हैं अच्छी फिल्म थी, यह है, वह है।” परन्तु वह कितने घंटे चली! इतना ही तो आनंद मिला, उसके बाद क्या करेंगे! अब कुछ करना चाहिए, तो लोग जाते हैं “कोई पिज़्जा खाएगा, कोई आइसक्रीम खाएगा, कोई कुछ करेगा, कोई कुछ करेगा।” क्योंकि आनंद को खोजता रहता है मनुष्य, क्योंकि उसको वह आनंद चाहिए और कहां-कहां नहीं खोजता है। वह सोचता है कि “अगर मैं सारी दुनिया को किसी तरीके से काबू में कर लूं तो मेरे को शांति मिल जाएगी, मैं सबसे ताकतवर आदमी हो जाऊंगा सारे संसार में।” उसमें भी उसको आनंद नहीं मिलता है।

जब ऐलग्ज़ैन्डर की बात आती है, सिकंदर की बात आती है, उसका नाम “ऐलग्ज़ैन्डर” विदेश में और हिंदुस्तान में उसको “सिकंदर” के नाम से जाना जाता है। वह सचमुच में बहुत ताकतवर राजा था और जब हिंदुस्तान आया वह तो उसको देली बेली के बारे में मालूम नहीं था, बीमार हो गया और फिर उसको वापस जाना पड़ा, तो उन्हीं राजाओं को जिनको उसने हराया था आते समय, जब जा रहा था वह तो कमजोर हो गया तो वही राजा लोग उस पर थूक रहे थे। वापिस गया वह और उसका शरीर पूरा हुआ तो उसने कहा कि “जब मेरा शरीर पूरा हो जाए और मेरे को ले जा रहे हो गाड़ने के लिए, दफनाने के लिए तो मेरे हाथों को बाहर निकाल देना और इसलिए निकाल देना कि मैं दिखाना चाहता हूं दुनिया को कि मैं खाली हाथ आया था और खाली हाथ मैं इस संसार से जा रहा हूँ। जो कुछ भी है, जो कुछ भी मेरे संबंध हैं, संबंधी हैं, जो कुछ भी मैंने कमाया, जो कुछ भी मैंने किया इन चीजों को मैं साथ नहीं ले जा सकता हूँ।”

हम खोज रहे हैं उस चीज को, मज़ा ले रहे हैं। अब कई लोग हैं, यही उनका मंत्र है कि हम सुबह से लेकर शाम तक इन चीजों का मजा लेंगे, परन्तु यह सिर्फ मज़ा लेने की चीज नहीं है, यह दुःखदायी भी है। एक ही ऐसी चीज है जो दुःखदायी नहीं है और वह है तुम्हारे अंदर। अगर तुमको इस संसार के अंदर रहना है और जो कुछ भी करना है, करना है इस संसार के अंदर, तो यह तो और जरूरी बात बन जाती है कि तुम उस चीज को पहचानो, जो तुम्हारे अंदर है। क्योंकि तुमको सुकून की जरूरत पड़ेगी, शांति की जरूरत पड़ेगी। जब तुम दुखी होगे इस संसार से तो कहां जाओगे! उस प्राणी के लिए जो इस संसार से दुखी है उसके लिए एक ही है और वह है तुम्हारे अंदर बैठा हुआ। वह तुमको संभाल सकता है, अगर तुम संभलना चाहो तो वह तुमको संभाल सकता है, वह तुमको बचा सकता है। इस दुनिया के अंदर जो कुछ भी हम करते हैं, जिस जाल में हम फंसे हुए हैं, है एक जाल ही या तो दिखाई नहीं देता। उसमें जाकर फंस जाते हैं। जैसे मकड़ी का जाल जो कीटाणु हैं, जो उसमें जाकर लगते हैं, उनको दिखाई नहीं देता। वह तो उड़ रहे हैं हवा से और जब उसमें अटक जाते हैं और जितना वह हिलने की कोशिश करते हैं, उससे निकलने की कोशिश करते हैं उतना ही वह और उसमें फंसते चले जाते हैं।

दुनिया का भी जाल ऐसा ही है — “आओ यह करो, तुम यह करो, तुम यह करो, तुम यह करो!” कितने जाल हो गए हैं, कितने जाल हो गए हैं — जब बच्चे थे तो एक ही चीज थी — खेलो, कूदो, मज़ा लो, आनंद लो, जब नींद आ जाये, सो जाओ, जब नींद नहीं आए यह किसी का झंझट नहीं है कि “क्या टाइम है, किसी ने घड़ी नहीं पहनी हुई है, यह नहीं है कि किसी ने अलार्म बजाई हुई है।” नहीं! रात को आँख खुल गई, रात को आँख खुल गई! दिन में नींद आ गई, दिन में नींद आ गई! खाना कब खाना है जब भूख लगे। सोना कब है जब नींद लगे। तो यह सारी चीजों पर आप निर्भर थे। मतलब, जिस चीज की आपको जरूरत थी, जो चीज आप चाहते थे उसकी प्यास अंदर से लगती थी, तो पानी की प्यास लगी या भोजन की भूख लगी या नींद आयी, तो उसी के हिसाब से आप सबकुछ करते थे।

धीरे-धीरे करके यह सारे जो नाते हैं, यह टूटते हैं, जो आपके साथ नाते हैं, अपने नाते, टूटते हैं। तो फिर क्या होता है कि आदमी को नींद आ रही है, परंतु वह सो नहीं सकता है। इसलिए नहीं सो सकता कि किसी मीटिंग में है या कार चला रहा है या कुछ कर रहा है या कुछ कर रहा है। अंदर से तो आवाज आ रही है, अंदर से तो यह महसूस कर रहा है कि “वह थका हुआ है और उसको सोने की जरूरत है।” परंतु वह फिर कुछ ना कुछ करके चाय पीकर, यह करके, वह करके, हाथ मसल करके, ठंडा पानी डालकर अपने आपको सचेत करता है ताकि वह कर सके तो जो वह करना चाहता है। भूख लगती है, भूख लगती है तो घड़ी की तरफ देखता है कि खाने का समय हो गया है या नहीं। वह चीजें चली गयीं कि जब भूख लगी तो खाना खाना है। वह चीजें चली गयीं कि जब भूख लगी तो खाना खाना है, जब प्यास लगी तो पानी पीना है। अब वह घड़ी को देखता है, अब वह अपने समाज को देखता है कि समाज क्या कह रहा है, समाज किस तरीके से कह रहा है, किस तरीके से रह रहा है, किस तरीके से कर रहा है और धीरे-धीरे-धीरे करके इन्हीं झंझटों में मनुष्य पड़ता रहता है, पड़ता रहता है, पड़ता रहता है, पड़ता रहता है, पड़ता रहता है। और असली चीज उससे दूर हो रही है और वह असली चीज है कहाँ ? वह कहीं पेड़ पर नहीं लगी हुई है, कहीं सितारों में नहीं है, वह स्वयं उसके अंदर है। परन्तु वह अपने आपको भी पहचान नहीं सकता है अब। मतलब, वह अपने से ही इतना विपरीत हो गया है, जैसे-जैसे-जैसे-जैसे-जैसे समय चलता है कि “वह क्यों है यहां यह उसको नहीं मालूम।” यह उसको मालूम है कि क्या करना है, क्या करना है यह उसको मालूम है। और क्या है करना उसको ?

अगर परिवार में है कोई, तो पति को मालूम है क्या करना है — “सवेरे उसको उठना है, चाय पीनी है, गुसलखाना जाना है, तैयार होना है और तैयार होने के बाद नाश्ता करना है और फिर काम पर जाना है।” यह उसको मालूम है। यह उसको मालूम है। उसकी पत्नी को मालूम है उसको क्या करना है — “उसको सबसे पहले उठना है, चाय बनानी है, नाश्ता बनाना है, बच्चों को तैयार करना है, बच्चों को भेजना है फिर खुद तैयार हो करके सब्जियां लानी है और सब्जी लाकर खाना पकाना है और वह खाना पति को भेजना है लंच-टाइम के लिए और जब सब आयें वापिस तो सबके लिए खाना तैयार रखना है। शाम का खाना बनाना है, यह सारा काम है, घर साफ करना है।” यह सब करना है। यह सबको मालूम है। बच्चों को क्या मालूम है — “तैयार होना है, स्कूल जाना है, स्कूल जा करके अपना होम वर्क वापिस लाना है, होम वर्क करना है घर में और फिर दूसरे दिन वही करना है।” यह सबको मालूम है।

बड़े से बड़े लीडर को यह मालूम है कि क्या करना है। पर यह किसी को मालूम नहीं है कि “क्या करने के लिए आए थे!” मूल चीज क्या है! अगर यह सारी टेक्नोलॉजी जो आस-पास में है, यह न हो और एक समय नहीं थी, तब क्या करना था ? तब क्या करना था ? यही चीज है कि हम भूल गए कि हम यहां क्यों आये हैं! और यह याद है कि जो पट्टी दुनिया ने पढ़ाई है। वह सब याद है कि “यह करना है, यह करना है, यह करना है” और मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि यह नहीं करना है। मैं इसलिए क्रिटिसाइज़ नहीं कर रहा हूँ। मैं कह रहा हूँ कि इसमें एक चीज बहुत जरूरी है, इस सारे प्लान में जो आपका प्लान है कि “हम यह करेंगे, हम यह करेंगे, हम यह करेंगे, हम यह करेंगे।” क्योंकि प्लान तो है, लोगों का प्लान तो है इसमें तो कोई शक़ की बात नहीं है कि लोगों का प्लान नहीं है, प्लान तो है लोगों का। और क्या प्लान है लोगों का “हम यह करेंगे, ऐसा होगा, ऐसा होगा, ऐसा होगा, ऐसा होगा!” और कई बार, कई बार क्या! यह तो हमेशा की ही बात है कि प्लान वैसा नहीं होता है जैसा आपने बनाया हुआ है। उल्टा जाता है, उल्टा जाता है और फिर लोगों को अचंभा होता है कि “मेरे साथ यह क्यों हो रहा है, मैंने ऐसी क्या चीज कर दी ?”

अरे! बात इसकी नहीं है कि आपने यह क्या चीज कर दी, यह आपका बनाया हुआ प्लान है। यह उसका बनाया हुआ प्लान नहीं है, जिसने सारी सृष्टि की रचना की है। यह उसका बनाया हुआ प्लान नहीं है, यह आपका बनाया हुआ प्लान है और आपको बनाया हुआ प्लान आप देख रहे हैं। इसके इंचार्ज आप हैं, इसकी इच्छा भी आप ही की है, इसकी रचना भी आपने ही की है, इसकी पूर्ति के लिए भी आप ही लगे हुए हैं और भगवान को तो तब बुला लेते हैं जब कोई अनहोनी हो जाती है। तब कहते हैं कि “तैनें ऐसा क्यों कर दिया, तैनें ऐसा क्यों कर दिया” पर प्लान बनाया किसने ? प्लान बनाया तुमने, प्लान बनाया तुमने।

अब कई बार होता है, कोई चढ़ा बस में दुर्घटना हो गयी और नहीं पहुंचा वह। तो लोग क्या कहेंगे “भगवान तूने ऐसा क्यों कर दिया!” दोष देंगे भगवान को, पर बस का टिकट किसने खरीदा था! भगवान ने, भगवान ने तुमको टिकट दिया था, तुम्हारे हाथ में टिकट थमाया था कि “तुम इस बस में जाओ।” नहीं! तो यह सारी चीजें हैं और हम इस पर ध्यान नहीं देते हैं। हम इन चीजों को नहीं देखते हैं। हम चल रहे हैं, चल रहे हैं, चल रहे हैं, किस प्रकार चल रहे हैं, जैसे वह बैल जो कुएं के आस-पास चलता रहता है और उसके चलने से उस कुएं में से पानी निकलता है — बांधा हुआ है उस पर एक लकड़ी का वह हिस्सा रहता है वह गियर पर लगा रहता है और फिर वह पानी की जो चीज होती है कुएं में लगी हुई उसको चलाता है। पर क्या करते हैं उस बैल के साथ! उसकी आंखें बंद कर देते हैं ताकि उसको लगे ना कि कहां हैं! तो वह चक्कर ही चक्कर काटता है और क्या सोचता है वह “कहां से कहां पहुंच गया, क्या हो गया उसका!” कितनी दूर सारे, मतलब, आधा दिन अगर वह चले तो कहां से कहां पहुंच गया होगा, पर जब उसकी पट्टी खुलती है तो वह अपने आप को वहीं पाता है जहां वह था, यही होता है। तो मनुष्य अपने आप को वहीं पाता है जहां वह था। हाथ खाली, हृदय में इच्छा आनंद की क्योंकि सफल होना, इस संसार के अंदर सफल होना बहुत मुश्किल है। वह कोई बात नहीं करता, वह कोई बात नहीं करता है कि इस संसार में सफल होना क्यों मुश्किल है। क्योंकि अगर मेरे से कोई पूछे कि क्यों मुश्किल है, तो मैं कहूंगा यह मुश्किल नहीं है।

सफलता तुमको संसार से नहीं मिलेगी, सफलता तुम्हारे अंदर है। और जब तुम अंदर की तरफ झांककर देखोगे तो सफलता तुमको मिलेगी। तब तुम्हारी समझ में आएगी। तो लोगों का यह आचरण बना हुआ है, यह सबकुछ उन्होंने किया हुआ है कि “हम ऐसे हैं, हम ऐसे हैं, हम ऐसे हैं, हम ऐसे हैं, हमारे साथ यह है, हमारे साथ वह है, हम यह करेंगें, हम वह करेंगें” पर जब अपने अंदर मुड़कर नहीं देखोगे, तो फिर फायदा क्या है! यह एक भजन है —

कामिल काम कमाल किया,

तैंने ख्याल से खेल बनाय दिया||

नहीं कागज कलम जरुरत है,

बिन रंग बनी सब मूरत है |

इन मूरत में एक सूरत है,

तैंने एक अनेक लखाय दिया||

जल बून्द को लेकर देह रची,

सुर मानव दानव जीव जुदा|

सबके घट अन्दर मंदिर में,

तैंने आप मुकाम जमाय दिया ||

सबके घट अन्दर मंदिर में,

तैंने आप मुकाम जमाय दिया ||

सबसे जरूरी बात, सबसे जरूरी चीज!

कोई पार न वार अधार बिना,

सब जीव चराचर धार रहा |

बिन भूमि मनोहर महल खड़ा,

बिन बीज के बाग लगाय दिया ||

यह अंदर वाले की बात है! सब लोकन के नित संग रहे, (सुनिए आप) —

सब लोकन के नित संग रहे

फिर आप असंग स्वरुप सदा |

‘ब्रह्मानन्द’ आनंद भयो मन में,

गुरुदेव अलेख लखाय दिया ||

सारी समझ में आ गयी यह बात ? तो सबकुछ है, जो समझ में नहीं आती थी, जो अलेख था, जिसके बारे में कोई यह नहीं था कि मैं इस चीज को जानता हूं उसको गुरु ने दिखा दिया, उसको गुरु ने बता दिया। वह चीज है तुम्हारे अंदर।

इस दुनिया की वही बात है कि अभी तो लॉकडाउन में हैं लोग, फिर धीरे-धीरे गवर्नमेंट अनाउन्स कर रही है कि हफ्ते में, दो हफ्ते में, तीन हफ्ते में जब भी लॉकडाउन ईज़-अप होने लगेगा, लोग इधर उधर जाने लगेंगे तो मैं तो यही सब लोगों से पूछता हूँ कि “भाई! जब यह लॉकडाउन खत्म होगा तब तुम वही चीज करोगे जो करते आये हो!”

अभी प्रदूषण कम हुआ है। गंगा को साफ करने के लिए कितने परिश्रम हुए! गंगा को साफ करने के लिए कितने परिश्रम हुए। अरबों-अरबों रुपए खर्च हो गया जिससे पता नहीं कितने लोगों की भूख खत्म हो सकती थी, परंतु इस कोरोना वायरस ने गंगा को साफ कर दिया। इस कोरोना वायरस ने गंगा को साफ कर दिया। अच्छे-अच्छों को घर बिठा दिया और अच्छे-अच्छों के घर बैठने से सारी पृथ्वी के अंदर चैन की बंसी बजी है। समुद्रों में, नदियों में, सबको राहत मिली है। मनुष्य बेचैन है जरूर, पर पशु-पक्षियों को सबको राहत मिली है। क्या इस कोरोना वायरस लॉकडाउन के बाद हम फिर वही उटपटांग काम शुरू कर देंगे जो हम करते आ रहे हैं जिसकी वजह से ऐसे स्थान पर हम पहुंचे जहां इतनी सारी दिक्कत उठानी पड़ी! क्या इसी स्थान पर वापस पहुंचेंगे हम ? क्या इसी दर्ज़े पर वापिस आएंगे या कुछ अलग से करेंगे ताकि ऐसी नौबत दोबारा ना आये। क्या हम एक-दूसरे के तरफ देख करके, एक दूसरे की मदद करने की कोशिश करेंगे या जो हम से नीचे है उसके सिर पर खड़े होकर के किसी और के सिर पर जाएंगे! लालच! लालच! कितना लालची बन गया है!

इस समय यह कोरोना वायरस — यह धरती की (मेरे को ऐसा लगता है कि) धरती की पुकार थी कि कुछ हो ताकि कुछ राहत मिले, क्योंकि मनुष्य ऐसी-वैसी चीज से मानता नहीं है। मनुष्य को कहो “देख! यह प्रदूषण तेरे को मार रहा है।” लगे हुए हैं, लगे हुए हैं। प्रदूषण बनाने में लगे हुए हैं सब। कोई यह जला रहा है, कोई वह जला रहा है, कोई वह जला रहा है बाहर। सब चीजों से प्रदूषण हो रहा है। क्या इस बार कुछ सबक सीखेंगे या नहीं या फिर वही बात हो जाएगी जो पहले की थी! “भाई! अगर सबक सीख सके तो अच्छा रहेगा ताकि आगे हम बढ़ सकें, सभी लोग बढ़ सकें, आगे की तरफ चलें, अच्छा हो, आनंद से हो, सभी के जीवन में आनंद हो” यही बात है। क्योंकि जिस चीज की हम बात कर रहे हैं, वह है क्या! वह परमांनद की बात है, उस खुशी की बात है, उस सच्चाई की बात है।

अब लोग हैं जो बाहर की चीजों से परेशान हैं “मेरे साथ ऐसा क्यों होता है, ऐसा क्यों होता है, ऐसा क्यों होता है, ऐसा क्यों होता है।” कई लोग प्रश्न हमको भेजते हैं, यही उन प्रश्नों में लिखा हुआ है कि “ऐसा क्यों होता है, ऐसा क्यों होता है, ऐसा क्यों होता है।” पर यह अंदर की दुनिया में नहीं होता है। वहां से निराशा नहीं मिलती है, वहां आशा है, वहां निराशा नहीं है, वहां अंधेरा नहीं है, वहां उजाला है, वहां प्रश्न नहीं हैं, वहां उत्तर हैं और वह जगह है तुम्हारे अंदर, तुम्हारे हृदय में।

घट में है सूझे नहीं, लानत ऐसी जिन्द।

तुलसी या संसार को, भयो मोतियाबिंद।।

है तो तुम्हारे अंदर ही! बस जानो इस चीज को तो तुम्हारे जिंदगी के अंदर भी आनंद ही आनंद होगा। उस तरफ अगर देखोगे, उस तरफ जानोगे कि सच्ची बात होती है — अब कई लोग हैं आप देखेंगे जब पहाड़ पर चढ़ते हैं, अगर पहाड़ का ऐसा हिस्सा है और इस पर चढ़ रहे हैं तो क्या करते हैं ? रस्सी बांधी हुई है, रस्सी बांधी हुई है और रस्सी को इस तरीके से बांध लेते हैं कि अगर उनका पैर फिसल जाए तो रस्सी उनको बचा लेगी। तुम्हारी रस्सी कहां है, तुम्हारी रस्सी कहां है ? अगर तुम्हारी रस्सी नहीं है, पैर फिसलेगा, तुम गिरोगे तो गड़बड़ होगी। पैर फिसलेगा, जरूर फिसलेगा, पर तुम्हारी रस्सी कहाँ है! यह ज्ञान रूपी रस्सी, यह आनंद रूपी रस्सी, इससे बंधे रहो तो तुम्हारे जीवन के अंदर आनंद रहेगा।

सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!