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लॉकडाउन प्रेम रावत जी के साथ #37 (29 अप्रैल, 2020) – Hindi

“बाहर की परिस्थिति बदलेगी, बाहर कुछ भी हो सकता है। पर तुम्हारे अंदर क्या हो रहा है यह देखने की बात है। अंदर तुम किस चीज से जुड़े हुए हो, यह देखने की बात है। इस बात को पहचानो, अमल करो। ” —प्रेम रावत (29 अप्रैल, 2020)

यदि आप प्रेम रावत जी से कोई प्रश्न पूछना चाहते हैं, तो आप अपने सवाल PremRawat.com (staging.premrawat.com/engage/contact) के माध्यम से भेज सकते हैं।

Audio

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोताओं को हमारा बहुत-बहुत नमस्कार! आज एक भजन से मैं चालू करना चाहता हूं और भजन है —

हम ना मरैं, मरिहैं संसारा। (आपने सुना होगा)

हमको मिला, जियावन हारा।। (कबीरदास जी का भजन है)

साकत मरैं संत जन जिवैं। भरि भरि राम रसायन पीवैं।।

हरि मरिहैं तो हमहूँ मरिहैं। हरि न मरैं हम काहे कूँ मरिहै।।

कहैं कबीर मन मनहि मिलावा। अमर भये सुख सागर पावा।।

मतलब क्या हुआ इसका कि हम नहीं मरेंगे यह संसार मरेगा। क्योंकि सभी की यही धारणा होती है कि “नहीं! यह संसार तो रहेगा हमको जाना है।” यहां कबीरदास जी उल्टा बोल रहे हैं कि “हम रहेंगे, संसार जाएगा।” क्योंकि हमको कौन मिल गया है! हमको मिल गया है वह जो “जियावन हारा” है, सब के सब जीवों को जो वह जीवन दान देता है वह हमको मिल गया है। “साकत मरैं” — जो इस संसार के अंदर चक्कर काट रहे हैं, जो संसार में, माया में लिपटे हुए हैं जिनको देखना भी नहीं आता है , भूल गए, भूल गए कि वह अपनी तरफ देखें, भूल गए कि असली चीज क्या है! सब कुछ भूल गए। मां-बाप अपने बेटे को जब — हर एक मां-बाप कुछ ना कुछ कहते रहते हैं अपने बेटे को, बच्चे को, बच्चियों को। तो धीरे-धीरे बच्चे को भी एक बात समझ में आती है। क्योंकि वह उस तरीके से नहीं सोचता है (बच्चा) जैसे जो लोग हैं वह सोचते हैं, जो बड़े हो गए वह सोचते हैं, उस तरीके से नहीं सोचता, वह सोचता है दूसरे तरीके से।

क्या सोचता है वह ? वह यह सोच रहा है कि मैं जो भी करूं मैं अपने मां-बाप को खुश नहीं कर सकता। क्योंकि हमेशा कुछ ना कुछ कहते रहते हैं , कुछ ना कुछ कहते रहते हैं, कुछ ना कुछ कहते रहते हैं। पति है — बीवी पति को कुछ ना कुछ कहती रहती है, कुछ ना कुछ कहती रहती है, कुछ ना कुछ कहती रहती है, “तुम यह ठीक नहीं करते, तुम यह ठीक नहीं करते, यह ठीक नहीं करते।” पति तो बड़ा हो गया है, परन्तु फिर भी उसके दिमाग में क्या बात आती है कि “मैं कुछ कर नहीं सकता कि मैं अपनी बीवी को खुश करूँ!”

पति अपनी बीवी को कुछ ना कुछ कहता रहता है, कभी यह कहता है, कभी वह कहता है, “तू यह नहीं ठीक करती है, तू यह नहीं ठीक करती है, तू यह नहीं ठीक करती है।” तो उसके दिमाग में भी एक बात आती है, वह क्या बात है कि मैं “ऐसा कुछ नहीं कर सकती जिससे कि मेरा पति खुश हो!”

जब यही चीज मां-बाप के साथ होती है, मां-बाप कुछ कह रहे हैं और बेटा यह कहता रहता है “तुम यह नहीं करते, तुम यह नहीं करते, तुम यह नहीं करते, तुम यह नहीं करते” तो मां-बाप के भी दिमाग में एक बात अगर बैठ गई कि “मैं जो भी करूं, मैं कभी खुश नहीं कर पाऊंगा इनको!” तो वह सबसे खराब बात है।

इस संसार के अंदर कई लोग हैं जिनके साथ यही हो गया है कि “यह माया ही सबकुछ है, इस माया से ही सबकुछ मिलेगा।” बड़ा नाम कमाते हैं, तो उनको वह नाम कमाना है माया को लेकर के। कुछ ठीक करना है तो माया को लेकर के। बड़ा आदमी बनना है तो माया को लेकर के और यह सारी शान-शौकत, यह सारी चीजें उनको चाहिए, क्योंकि वह अपने आपको भूल चुके हैं, कौन हैं! और जब मन में यह बात आती रहती है बार-बार “यह ठीक नहीं है, यह ठीक नहीं है, यह ठीक नहीं है, यह ठीक नहीं है, यह ठीक नहीं है” तो एक चीज वह जो हृदय है, जो कहता है कि “नहीं! मेरे को शांति चाहिए, मैं खुश होना चाहता हूं।” वह भी बैठ जाता है कि “मैं कुछ भी करूं यह खुश नहीं होगा, इसको आनंद नहीं मिलेगा।” जब यह हाल हो जाता है और यह बहुत गंभीर बात है, क्योंकि माता-पिता यह बात याद रखें अपने बच्चों को लेकर के। बच्चे याद रखें अपने माता-पिता को लेकर के। पति याद रखे अपनी मिसेज़ को लेकर के, अपनी पत्नी को लेकर के। पत्नी याद रखे अपने पति को लेकर के।

क्योंकि अगर ऐसा माहौल बन गया एक बार तो फिर इस चेन को तोड़ना बहुत मुश्किल है, बहुत मुश्किल है। क्योंकि फिर बैठ जाती है बात कि “मैं कुछ भी करूं यह खुश नहीं होगा, होगी।” अगर यह बात हो गई तो फिर हो गयी। इसलिए “साकत मरैं” — वह लोग जो इस माया में लिपटे हुए हैं, वह जरूर मरेंगे। “संत जन” — जो लोगों का भला चाहते हैं, जो इस दुनिया में भला करने के लिए आते हैं, वह नहीं मरेंगे। और उल्टा क्या भरेंगे वह, करेंगे क्या — “भरि भरि राम रसायन पीवैं” तो उस ज्ञान को, उस ज्ञान के प्याले को भर-भर के उसके अंदर का जो आनंद है वह ले रहे हैं। अगर हरि मरे तो हम मरेंगे — “हरि मरिहैं तो हमहूँ मरिहैं। हरि न मरैं हम काहे कूँ मरिहै” — अगर जब हरि नहीं मरेंगे — अगर हरि मरेंगे तो हम मरेंगे। अगर हरि नहीं मरेंगे तो हम नहीं मरेंगे।

तो आपको लगता नहीं है कि इसमें एक बात स्पष्ट हो रही है इस भजन में, जो कबीरदास जी कह रहे हैं एक बात स्पष्ट हो रही है कि “अपने आप को उस हरि में खो दो, उस हरि से जोड़ लो, जो तुम्हारे अंदर का हरि है।” बाहर का हरि नहीं, अंदर का जो हरि है, जो अंदर तुम्हारे, इस सारे विश्व को चलाने वाला जो बैठा है अगर उसके साथ तुम जुड़ गए, उसके साथ तुम मिल गए तो यही होगा। “हरि न मरैं तो हम काहे कूँ मरिहै” — कैसे मर सकते हैं क्योंकि उनके साथ जुड़ गये, उनके साथ एक हो गये और “कहैं कबीर मन मनहि मिलावा” — अगर मेरा मन उस हरि के साथ, उस शक्ति के साथ मिल गया तो हम “अमर भये सुख सागर पावा!” हम अमर हैं उसके बाद फिर हम मरेंगे नहीं और सुख का सागर हमारे साथ रहेगा।

कितना सुंदर भजन है यह और मैंने गाया है इस भजन को। मेरे को लगता है कि सचमुच में अगर हम अपने जीवन के अंदर यह कर पाये कि हम उससे एक हो गए। हम माया से एक होने की कोशिश तो करते ही हैं भाई!! यह जो सारा संसार है इसके जितने भी रीति हैं, रिवाज़ हैं यह सबकुछ — अब देखिये, क्योंकि लोग फेसबुक पर हैं, इंस्टाग्राम में है, ट्वीट पर हैं तो लोग विदेश से अपनी फोटो देते हैं, अपनी सेल्फीज़ देते हैं, हिंदुस्तान से अपनी सेल्फीज़ लोग देते हैं। धीरे-धीरे सब एक जैसे हो रहे हैं। कहीं भी चले जाओ लोग देखने में भी एक-जैसे लग रहे हैं। क्योंकि एक-दूसरे का जो फैशन है, यह है, वह है, सारी चीजें एक दूसरे के जैसे लग रहे हैं। उससे पहले यह नहीं था। जो कल्चर था, जो लोकल कल्चर था वह गायब हो रहा है — इसे कहते हैं “टेक्नोलॉजी।” यह टेक्नोलॉजी तुम्हारे कल्चर को गायब कर रही है।

एक आदमी के पास एक माइक्रोवेव ओवन था तो हिंदुस्तानी खाना उसमें वह बनाता था। एक बार पूछा गया उससे कि “तुम माइक्रोवेव में हिंदुस्तानी खाना बनाते हो, अच्छा तो नहीं लगता होगा?”

तो कहा, “जी! स्वाद तो बहुत ही खराब है, परन्तु खाना बहुत जल्दी बन जाता है।”

हमने कहा कि, “तुम खाना स्वाद के लिए खाते हो या घड़ी के लिए खाते हो! तुम घड़ी क्यों नहीं खा लेते!” घड़ी से ही तुमको इतना प्रेम है अगर, टाइम से ही इतना प्रेम है और टाइम को तुमसे प्रेम नहीं है, टाइम को तुमसे प्रेम नहीं है। टाइम तो चलता रहेगा, चलता रहेगा तुम्हारे लिए इंतजार नहीं करता है कभी। परन्तु तुम उस टाइम से प्रेम करते हो कि “मेरा टाइम यहां हो जाएगा, तो यह हो जाएगा, यह हो जाएगा, यह हो जाएगा!” लोग भाग रहे हैं, भाग रहे हैं, भाग रहे हैं, भाग रहे हैं, भाग रहे हैं, सब भाग रहे हैं, पर किसी को यह नहीं मालूम कि कहां जा रहे हैं! जब यह दशा हो गई तो आदमी फिर चाहता है कि उसको शांति मिले, उसको सुकून मिले, कैसे मिलेगा ? जब वह भाग रहा है, पर उसको यह नहीं मालूम कि वह ठीक है, नहीं ठीक है, क्या है उसकी जिंदगी में, क्या हो रहा है, क्या नहीं हो रहा है, टाइम के पीछे पड़ा हुआ है — “टाइम, टाइम, टाइम, टाइम, टाइम, पर क्यों बचा रहा है टाइम, क्या करेगा उस टाइम का वह ?” उसको यह खुद ही नहीं मालूम।

यह जो कोरोना वायरस की वजह से सब लोगों को घर पर बिठा दिया, अब लोगों के हाल खराब हो रहे हैं, लोग बैठ नहीं सकते, “हमको बाहर निकलना है, हमको यह करना है, हमको वह करना है, यह करना है, वह करना है , वह करना है।” इस सब के पीछे लगा हुआ है। कुछ भी परिस्थिति हो, कहां से तुम ठीक हो बाहर से या अंदर से ? बाहर परिस्थिति बदलेगी कुछ भी हो सकता है बाहर। पर अंदर तुम्हारे क्या हो रहा है यह देखने की बात है। अंदर तुम किस चीज से जुड़े हुए हो, यह देखने की बात है। जबतक इस बात को पहचानोगे नहीं अपने जीवन में, जानोगे नहीं अपने जीवन में, अमल नहीं करोगे, जो कबीरदास जी ने कहा कि —

कहैं कबीर मन मनहि मिलावा

मेरा मन उनके मन से मिल गया है, जो उनकी ख़्वाहिश है, वह मेरी ख़्वाहिश है। वह जिसको मैं कहता हूं कि जो जरूरत है, चाहत नहीं जरूरत। क्योंकि तुम्हारी भी कुछ जरूरत है, पर तुम उनको चाहत समझते हो। वह चाहत नहीं है, चाहत अलग होती है, जरूरत अलग होती है और जरूरत जो तुम्हारी हैं — शांति के लिए तुम्हारी जरूरत है, तुमको जरूरत है शांति की। बिना शांति के अगर तुम अपने जीवन के अंदर रहना चाहो तो बड़ी गड़बड़ होगी।

तुमको चैन की जरूरत है, तुमको सुख की जरूरत है ? चाहत क्या है तुम्हारी ? लाल साड़ी, पीली शर्ट, यह तुम्हारी चाहतें हैं। यह मिलें न मिलें इनसे कुछ नहीं होना है, पर अगर जो तुम्हारी जरूरत है — हवा तुम्हारे लिए जरूरी है, हवा नहीं मिली तो तुम मर जाओगे। भोजन तुम्हारे लिए जरूरी है, भोजन नहीं मिलेगा तो तुम मर जाओगे। पानी तुम्हारे लिए जरूरी है, पानी नहीं मिलेगा तो तुम मर जाओगे। तो जो तुम्हारी जरूरतें है, शांति भी ऐसी ही तुम्हारी जरूरत है। और अगर शांति नहीं मिली तो भटकते रहोगे। अंदर की जो चीज है अगर वह नहीं मिली तो भटकते रहोगे, खोजते रहोगे परन्तु तुम खोजोगे, कैसे खोजोगे तुम यह भी नहीं जानोगे कि तुम खोज रहे हो। तुमको यह भी नहीं पता कि किस चीज को खोज रहे हो! पर तुमको सिर्फ यह मालूम पड़ेगा कि “हां मैं किसी चीज को ढूंढ जरूर रहा हूँ, क्या है वह मेरे को नहीं मालूम।” जब ऐसी परिस्थिति हो जाती है मनुष्य की तो उसको इस संसार में धक्के मिलेंगे। और क्या मिलेगा ? फिर वह अपने से कैसे बात करेगा, अपने को वह क्या कहेगा, अपने को वह क्या समझाएगा मनुष्य कि “मेरे को यह मौका मिला, यह जीवन मिला और मैंने क्या किया, क्या किया, क्या पाया ?” आज जो मैं जिया हूं इस संसार के अंदर 60 साल, 70 साल, 80 साल, 90 साल, 100 साल — 36500 दिन (100 साल अगर जीयें तो) तो आज मेरे पास क्या है हर एक दिन को यह दिखाने के लिए कि मैंने यह हासिल किया है! कुछ नहीं रह गया।

मैंने देखा है अच्छे-अच्छे लोगों को देखा है, पड़े हुए हैं पलंग पर, कई अस्पताल में पड़े हुए हैं, कोई घर पर पड़ा हुआ है। लोग आस-पास भी ज्यादा नहीं रहते। सब शांत कोई बोलता भी नहीं है। आँख बंद है तो आँख बंद है। स्वांस ले रहे हैं, मशीन लगी हुई है — पिंग; पिंग; पिंग; पिंग; पिंग; वह यह दिखा रही है अभी जीवित है, अभी जीवित है, अभी जीवित है। चारपाई से उठ नहीं सकते। क्या हासिल कर लिया ? तो उस समय यह अपबल, तपबल और बाहुबल इसका क्या करोगे ? इसी में तो सारी जिंदगी लगा दी। अपबल — “मैंने यह कर लिया, मैंने वह कर लिया!” तपबल — “मैंने यह हासिल किया है, मैंने वह हासिल किया है!” यह सारे बल हैं और बाहुबल — एक्सरसाइज मशीन में जाते हैं। यह हो रही है एक्सरसाइज, कोई वेइट्स ऊपर-नीचे कर रहा है। अपबल, तपबल और बाहुबल — इन्हीं बल के पीछे सारा संसार लगा हुआ है।

परन्तु तुम समझते हो कि जब सौ साल के बाद तुम उस चारपाई पर बैठे होगे, तो इनमें से एक भी बल काम करेगा! कैसे काम करेगा ? कैसे काम कर सकता है ? बाहुबल का तो नाम मत लो। तप — अगर लगी हुई है कोई सर्टिफिकेट तुम्हारे दीवाल पर तो वहीं की वहीं लगी रहेगी। वह क्या करेगी ? कुछ नहीं। “तुमने यह कर लिया, तुमने वह कर लिया” — कौन आएगा तुमको पूछने के लिए क्या कर लिया ? कोई नहीं! यही हालत होनी है, तो उस समय कौन काम आएगा ? उस समय क्या काम आएगा ? अगर उस समय हृदय भरा हुआ नहीं है आनंद से तो और चीजें क्या काम आयेंगी ? कुछ काम नहीं आएगा।

यह सोचने की बात है, विचार करने की बात है। और अब जैसे मैंने कहा कि “पीस एजुकेशन प्रोग्राम हिंदी में भी करेंगे।” उसमें थोड़ा समय लगेगा, उसको सेट करने में। क्योंकि हिंदी में पूरा नहीं है वह काफी हद तक वह अंग्रेजी में है। परन्तु उसको भी करेंगे, प्रेज़न्ट करेंगे सभी लोगों को।

सभी श्रोताओं को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार!