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लॉकडाउन प्रेम रावत जी के साथ #36 (28 अप्रैल, 2020) – Hindi

“समस्याओं का तो हल निकाला जा सकता है, पर एक सबसे बड़ी समस्या यह है कि आप इन समस्याओं में उलझ कर इस समय को बेकार कर रहे हैं। और उस समस्या का हल आपके अंदर है, आपके हृदय में।” —प्रेम रावत (28 अप्रैल, 2020)

यदि आप प्रेम रावत जी से कोई प्रश्न पूछना चाहते हैं, तो आप अपने सवाल PremRawat.com (staging.premrawat.com/engage/contact) के माध्यम से भेज सकते हैं।

Audio

प्रेम रावत जी:

सभी श्रोताओं को हमारा नमस्कार!

मुझे यही आशा है कि सभी लोग कुशल-मंगल होंगें। और क्या हो सकते हैं, क्योंकि दुःख तो हम अपने कंधों पर डालते ही हैं। ऐसी परिस्थिति भी हम ही लोग बनाते हैं जिससे कि फिर दुःख होता है और संभावना तो यह है कि आनंद हो, संभावना तो यह है कि दिल में खुशी हो, हृदय में खुशी हो और शांति हो। परंतु कई बार हम ही लोग अपने जीवन में ऐसा-ऐसा माहौल बनाते हैं जिससे कि फिर दुःख होता है। पर जब हम यह करते हैं तब हमको यह ख्याल नहीं आता है कि हम क्या कर रहे हैं।

देखिये एक बात है, एक कहानी के रूप में लीजिए इसको आप। एक बार जब द्रौपदी की शादी नहीं हुई होती है तो खबर आई महल में कि एक बहुत पहुंचे हुए साधु-संत आये हैं और उनका दर्शन जरूर करना चाहिए। तो द्रौपदी ने कहा “मैं भी जाऊंगी, मैं भी दर्शन करना चाहती हूं।” द्रोपदी गई तो और कोई नहीं थे वह वेदव्यास जी थे और उनके पीछे गणेश जी लिखने के लिए बैठे थे। तो द्रौपदी ने उनको प्रणाम किया कहा “महाराज! मेरा भविष्य भी बताइये।”

तो वेदव्यास जी ने कहा, “ठीक है!” (उनको मालूम था कि क्या होने वाला है)

तो उन्होंने द्रौपदी का हाथ, हाथ में लिया उसको देखा कहा कि “द्रौपदी तुम्हारे कारण करोड़ों लोग मरेंगे, खून की नदियां बहाई जाएंगी।”

तो द्रौपदी को धक्का-सा लगा कहा, “महाराज मैं तो नहीं चाहती हूं कि मेरे कारण करोड़ों लोग मरें, मेरे कारण खून की नदियां बहें। तो कुछ आप इलाज नहीं बता सकते हैं, कुछ ऐसा नहीं बता सकते हैं जिससे कि मैं बच जाऊं।”

आजकल के लोग जब सुनते हैं कि ऐसा नहीं है या यह ठीक नहीं है या यह ग्रह ठीक नहीं है या कोई मांगलिक है या कुछ है, कुछ है तो कुछ ना कुछ करना चाहते हैं ताकि उसका जो बुरा असर है वह ना हो। लोगों के अपने ख्याल हैं, अपनी बातचीत है जो-जो उनके मन में आता है।

तो वेदव्यास जी ने कहा, “ठीक है! तुम तीन काम करो अगर तो यह खून की नदियां नहीं बहेंगी। एक तो किसी को ठेस मत पहुंचाओ, किसी को ठेस मत पहुंचाओ और जिसको तुमने ठेस पहुंचाई है, जिसको तुमने ठेस पहुंचाई है अगर वह तुमको ठेस पहुंचाए तो ठीक है उसको सह लो, पर अगर सह नहीं पाओ तो कभी बदला लेने के लिए तैयार मत हो, कभी बदला मत लेना। इसलिए किसी को ठेस मत पहुंचाओ और अगर तुमको कोई ठेस पहुंचाए तो वह अपने तक पहुंचने न दो, मतलब उसका बुरा असर जो है, उसका बुरा ना मानो। अगर बुरा मान भी गए तो बदला लेने की मत ठानना।”

तो द्रौपदी ने कहा, “यह तो बहुत आसान काम है यह तो मैं कर सकती हूं, तो मैं करूंगी।” परन्तु जब समय आया तो यही तीन चीजें ऐसी हुईं कि उनको पता था और पता होने के बाद भी ऐसी हुईं, ऐसी हुईं कि खून की नदी बहीं। क्या हुआ! महल में, जब दुर्योधन आया देखने के लिए महल, क्योंकि बहुत विचित्र महल था तो जब आया तो जहां पानी था तो उसको लगा कि “मैं पानी से नहीं गुजरूंगा।”

द्रौपदी ने कहा “इधर से आइये!”

तो उसने कहा, “नहीं, नहीं मैं तो सीधा चला जाता हूँ।” जैसे ही सीधे गए तो पानी में गिर गए और द्रौपदी हंस दी।

पहली बात, दुर्योधन को ठेस लगी, जो ठेस लगी तो उसने कहा कि “मैं इसका बदला लूंगा!” (उसने कहा, दुर्योधन ने)। तो फिर चीर-हरण हुआ। जब चीर-हरण हुआ तो द्रौपदी सचमुच में बुरा मान गयी — कहा हुआ था कि “बुरा मत मानना” पर बुरा मान गयी! और परिस्थिति भी ऐसी थी कि कोई भी बुरा मान जाये और बुरा मानने के बाद उसने कहा कि “मैं तो बदला लूंगी!” और खून की नदियां बहीं। जानते हुए भी यह तीनों चीजें हुईं।

आज हम यहां बैठ करके इन चीजों के बारे में सोच सकते हैं, पर जब यह चीजें होती हैं तब वह शक्ति नहीं रहती कि हम इसको देखें कि हम क्या करने जा रहे हैं और जिंदगी के अंदर आनंद पाने के लिए, शांति पाने के लिए यह चीज बहुत जरूरी है कि हम क्या करने जा रहे हैं! जो सचेत रहकर के, चेतना से जिंदगी को जीने की बात है वह यही बात है, क्योंकि कर्मों का फल तो मिलेगा, जो भी कर्म करोगे, अगले जन्म में नहीं इस जन्म में, किसी न किसी तरीके से इस जन्म में उन कर्मों का फल मिलेगा।

लोग हैं जो लोगों की तरफ देखते हैं, दूसरों की तरफ देखते हैं कहते हैं “वह भाग्यशाली है, मैं भाग्यशाली नहीं हूं।” क्यों ? तुम जो देख रहे हो वह बाहर से देख रहे हो। अंदर क्या समस्याएं हैं, उस आदमी के मन में क्या गुजर रही है, उस पर क्या गुजरती है, यह नहीं देखते लोग। सिर्फ बाहर से क्या-क्या हो रहा है यह देखते हैं — “बाहर से यह है, बाहर से वह है।” पर उसके साथ क्या गुजर रही है, वह नहीं देखते। बड़े-बड़े लोग जब आते हैं, टेलीविज़न के पास आते हैं, टेलीविज़न कैमरा के पास आते हैं तो मुस्कुराते हैं और घर जाते हैं तो चिंता, चिंता, चिंता, चिंता, चिंता। इसलिए कहा कि —

चिंता तो सतनाम की, और न चितवे दास,

और जो चितवे नाम बिनु, सोई काल की फांस

हर एक चीजों के बारे में मनुष्य चिंता करता है। उन समस्याओं के बारे में भी चिंता करता है जो समस्या सिर्फ ख्याल में हैं, जो सही में नहीं हैं, असल में नहीं हैं, उनके बारे में भी वह चिंता करता है। उसको चिंता है हर एक चीज की और उस चिंता में खो करके यह जो जीवन है इसको खोता है। लोगों को स्वर्ग जाने की इतनी चिंता रहती है — अब स्वर्ग है या नहीं है! मैं तो नहीं कह सकता, मैं तो नहीं बता सकता, मैं तो अभी जिंदा हूं। पर इतनी बात मैं बता सकता हूं कि अगर कहीं स्वर्ग है तो यहां है और अगर कहीं नरक है तो यहां है। यह मैं कह सकता हूँ, इस बात की मैं गारंटी दे सकता हूं। यह बात आपको भी अच्छी तरीके से मालूम है। आगे क्या है आपको नहीं मालूम। जो कुछ मालूम है वह आपने सुना है पर आपको क्या मालूम है वह सिर्फ यही क्योंकि और चीजों में तो आपको विश्वास करना पड़ता है, पर जो सही चीज है वह यही है कि जैसे कहा है —

राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय।

जो सुख साधू संग में, सो बैकुंठ न होय ।।

क्यों जाना चाहते हैं बैकुंठ ? सुखी होने के लिए, पर जो सुख यहां है, जो सुख उस आनंद में है, जो आनंद तुम्हारे अंदर है जो सुख उस शांति में है, जो शांति तुम्हारे अंदर है, वह बैकुंठ में भी नहीं है। बहुत बड़ी बात कह दी, यह तो बहुत बड़ी बात कह दी। पर कह दिया, क्योंकि यह सही बात है। और सबकुछ सोच की बात है और सबकुछ विचारने की बात है, परंतु जो है, वह है। लोग हैं इस दुनिया के अंदर “सात जन्म तक साथ निभाएंगे।” तुमको कैसे मालूम, तुमको कैसे मालूम और यही आठवां हुआ तो फिर!! मतलब, सबकुछ जो उन लोगों ने कहा है उसी पर लोग अपनी जिंदगी की बुनियाद डालते हैं और यह कभी नहीं देखते हैं कि यह कितनी मजबूत है।

समुद्र के किनारे अगर आप जो रेत है उसको इकट्ठा करके उसका एक थोड़ा-सा मकान भी अगर आप बनाएं तो ज्यादा देर नहीं टिकेगा। क्योंकि जो समुद्र का पानी है वह आ करके उसको तहस-नहस कर देगा, नष्ट कर देगा। समय भी एक ऐसी चीज है अपने आप को समझो कि आप भी एक समुद्र के तट पर हो, परंतु यह समुद्र का जो पानी है, वह पानी नहीं बल्कि समय है और वह लहरों की तरह आता रहता है, जाता रहता है, आता रहता है, जाता रहता है और एक दिन आएगा और जो कुछ भी इस विश्वास की दुनिया ने आपको बताया हुआ है जिस पर आपने अपनी बुनियादी सारी चीजों पर भरोसा किया है वह लहर सबको नष्ट कर देगी। क्या बचेगा ? क्या बचेगा ? जो आनंद है वह बचेगा।

जैसे मैं कई बार कहता हूं कि जब आप कहीं जाते हैं तो अगर आपके दोस्त ने या किसी परिवार ने आपको खाने पर बुलाया। अच्छे-अच्छे पकवान — आप जैसे ही घर में आए आपकी खातिरदारी की गई। बैठे आप लोग, आपने बात की, आपने कुछ मज़ाक किया, आपको अच्छा लगा, आनंद आया, फिर बढ़िया सुंदर भोजन परोसा गया और आपको बिल्कुल अच्छा लगा और बड़ी रुचि से आपने उसको खाया और खाने के बाद आपको मीठा भी कुछ दिया गया, मिठाई भी कुछ दी गई वह भी आपको बहुत सुंदर लगी और सचमुच में आप तृप्त हो गए, संतुष्ट हो गए। तो जब आप उस घर से, वहां से चले और बात तो यही है कि अगली सुबह खाना तो सब निकल जाएगा और (नहीं निकलेगा तो फिर गड़बड़ होगी) फिर खाना निकल जाएगा, परन्तु याद नहीं निकलेगी, उस दिन की याद नहीं निकलेगी।

अब मैं कई बार उदाहरण देता हूं यह — एक बार मेरे को बुलाया गया था भोजन पर। तो जब मेरे को बताया गया कि कहां जाना है भोजन पर, तो मैंने उस दोपहर में भी बहुत कम खाया इसलिए कि मेरे को ऐसा लगा कि जहां जाना है वहां बढ़िया-बढ़िया पकवान मिलेंगे, खूब डटकर खायेंगें। तो पहुंचे वहां और उस दिन खाना खाया, ज्यादा नहीं थोड़ा खाया (रात को जहां भोजन पर बुलाया था वहां) अब वह भोजन जो खाया उस दिन थोड़ा-बहुत वह तो कब का चला गया और जिसके यहां खाया था वह भी चला गया। अब पता नहीं उनलोगों में से कौन जिन्दा बाकी बचा है, परंतु उस दिन की याद आज भी ताजी है मेरे दिमाग में, क्योंकि उस दिन हुआ क्या कि मैं जैसे ही बैठा खाने के लिए तो सचमुच में बहुत सुंदर थाली सजी हुई थी, तरह-तरह के पकवान थे और जैसे ही खाया सब मीठा। दाल भी मीठी, सब्जी भी मीठी, दूसरी सब्जी भी मीठी, तीसरी सब्जी भी मीठी — ऐसा तो मैंने कभी अपनी जिंदगी में खाया ही नहीं था। मैं बहुत छोटा था उस समय, तो यह हुआ।

इस संसार के अंदर जो हम आए हैं, जो कुछ भी हमने किया है, बाहर हमने अपना मकान बनाया, बिज़नेस बनाया, यह खरीदा, वह खरीदा, यह किया, वह किया, नाम कमाया, यह किया, बच्चे पैदा किए, जो कुछ भी किया वह तो सब साथ जाएंगे नहीं, साथ तो किसी ने जाना नहीं है, घर तो साथ जाएगा नहीं, कार तो साथ जाएगी नहीं, यह सारी चीजें तो साथ जाएंगी नहीं। क्या जाएगा! शरीर तो जाएगा नहीं, यह आंखें, यह चेहरा, यह दांत, सबकुछ, जिस चीज को देख करके आप यह कहते हैं “यह मेरी फोटो है, मेरी-मेरी फोटो है, यह मैं हूं, यह मेरा है” वह तो सब यहीं रह जाएगा। तो जायेगा क्या ? जैसे उस रात की बात वैसे ही अगर इस जीवन के अंदर आनंद लिया तो वह आनंद साथ जायेगा। और कुछ नहीं और अगर आनंद नहीं मिला तो वह भी साथ जाएगा। जो दुःख है वह भी साथ जाएगा। इसलिए मैं लोगों से कहता हूँ कि “दुखी मत हो।”

जो कुछ भी समस्या है, देखो समस्या जब आती है सामने तो बहुत बड़ी लगती है। तुम्हारा काम है उसको उस तरीके से देखना जो उसका सच्चा आकार है। तो जब थोड़ा दूर से देखते हैं उसी समस्या को तो वह इतनी बड़ी नहीं लगती है। चाहे जब नजदीक रहती है तो बहुत बड़ी लगती है, क्योंकि एकदम, सारा कुछ घेर लेती है। परन्तु थोड़ा-सा दूर से देखो तो छोटी लगेगी, और दूर से देखो तो फिर और छोटी लगेगी, और दूर से देखो तो और छोटी लगेगी। यही बात होती है।

समस्या का तो हल निकाला जा सकता है, पर एक सबसे बड़ी समस्या है आपके सामने, जो आप इन समस्याओं में उलझे हुए इस समय को जो बीता रहे हैं और खराब कर रहे हैं, बेकार कर रहे हैं वह सबसे बड़ी समस्या है। और उस समस्या का हल है आपके अंदर, आपके हृदय में। अपने आप को जानो, इस जीवन को सचेत हो करके जियो और अपने हृदय के अंदर वह आभार रखो, क्योंकि वही साथ जाएगा, वह आनंद साथ जायेगा। तो अगर यह सबकुछ हम कर सकें तो हमारे लिए सबकुछ है। हम आनंद लें अपनी जिंदगी में आखिरी स्वांस तक, आखिरी स्वांस तक। जो कुछ भी हमसे बन पड़े, वह हम करें उस आनंद के लिए। सब तो नहीं कर पायेंगें, सबकुछ तो नहीं कर पायेंगें, पर जो कुछ भी हम कर पाएं उससे आनंद लें। और सचमुच में उस बनानेवाले का हम यह अदा करें कि “सचमुच में धन्यवाद तेरा कि तैनें मुझे यह जिंदगी दी!”

कई लोग हैं जो इस जीवन को खत्म करने के लिए लगे हुए हैं, खुदकुशी करना चाहते हैं क्यों, क्यों ? जिस खुदकुशी को तुम आज करना चाहते हो, थोड़ा धीरज रखो यह अपने आप हो जायेगी, क्योंकि एक दिन तो सभी को जाना है यहां से। परन्तु बात है कि जबतक नहीं जायें तब तक हम किसी ना किसी तरीके से, किसी ना किसी विधि से आनंद लेने की कोशिश करें। यह नहीं है कि “उसने यह कह दिया अब मेरे लिए लोग क्या सोचेंगे!”

अभी कुछ साल पहले जब मैं एक जेल में था (मैंने कुछ गलत नहीं किया था, मैं कैदियों को देखने के लिए, उनसे बात करने के लिए गया था) तो हमने सुनाया उन लोगों को और सुनाने के बाद जब प्रश्न-उत्तरों का समय आया तो एक आदमी खड़ा हुआ उसने प्रश्न पूछा कि “जी! आप मेरे को यह बताइए कि कुछ ही दिनों में मैं यहां जेल से जाने वाला हूं, मेरा समय समाप्त हो गया है यहां और मैं अपने गांव जाऊंगा और मेरे को यह चिंता है कि जब मैं गांव जाऊंगा तो लोग मेरी तरफ देखेंगे और क्या सोचेंगे, मेरे बारे में क्या सोचेंगे ?”

तो सारे कैदी मेरी तरफ देखने लगे कि “कुछ कहिए इसको आप!”

मैंने कहा कि “भाई! तू सच सुनना चाहता है ?”

कहा, “हां!”

सारे कैदी मेरी तरफ देख रहे थे कि “क्या बोलेंगे यह!”

मैंने कहा, “सच यह है कि उनको कोई परवाह नहीं है तू कहां से आया है, तेरे साथ क्या हुआ है ? क्योंकि उनकी अपनी समस्याएं हैं उनके पीछे वो लगे हुए हैं। उनके पास टाइम नहीं है कि वह तेरे बारे में सोचें।”

तो सारे के सारे कैदी हंसने लगे। क्योंकि बात तो सही है। लोगों के पास टाइम नहीं है। बोल देते हैं, परन्तु सोचते नहीं हैं। तो भाई! सबसे बड़ी बात है कि तुम अगर अपनी आंखों में गिर गए तो सबकी आंखों में गिर गए और तुम अगर अपनी आंखों में नहीं गिरे तो सबकुछ ठीक है। लोग यही देखेंगे, लोग यही देखेंगे। शेर जब दहाड़ता है तो वह — शेर मार भी तो सकता है, पर दहाड़ता है। क्यों दहाड़ता है ? अगर उसके दहाड़ने से तुम भाग जाओ तो फिर उसको तुमको मारना नहीं पड़ेगा। शेर से तुम यह भी तो सीख सकते हो — “दहाड़ो” उनलोगों को लगेगा सब ठीक है।

अपने जीवन के अंदर इस जीवन को सफल बनाओ, आनंद लो और मौज से रहो!

सभी लोगों को मेरा बहुत-बहुत नमस्कार! आनंद-मंगल रहिये!